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Friday, December 4, 2009

क़ुरबानी मैं जानवर ही क्यों.-जरुरत है रिवाज बदलने की

आखिर क़ुरबानी में जानवरों को ही कुर्बान क्यों किया जाता हैक्या इंसानों और जानवरों को जीवन देने वाला भगवान या आल्लाह सचमुच इस बात के लिए आज्ञा देता है इंसानों को ? शायद नही, क्योंकि उसकी नजर में सभी जीव जंतु चाहे वो इन्सान के रूप में हो या जानवर के रूप में सब बराबर हैंबलि की प्रथा प्राचीन काल से चली रही है, हजारो सालो से इंसानों ने अपनी मनो कामना पूर्ण करने के लिए देवी और देवातावो और अल्लाह के सामने जानवरों का क़त्ल किया है, मगर कालांतर में आते -आते कुछ समाज ने इस प्रथा का बहिस्कार भी किया है, खास कर के अगर उत्तर भारत में देखा जाए तो माता वैष्णो को बलि के रूप में नारिअल तोडा जाता है . साउथ इंडिया में भी बलि का रिवाज ख़त्म हो गया है, नेपाल या गडवाल में कुछ रूप में बलि की प्रथा आज भी प्रचलित है साथ साथ बंगाल और आसाम में भी

भारत के (हिंदू वर्ग) के लोगो ने अपने आप को समय के साथ बदलना सिखा है और सदियों से जब जब जरुरत पड़ती रही है अपने आप को और अपनी परम्परा में अपनी जरुरत के हिसाब से बदलाव किया है, और सही भी है, आज अगर हमें चावल नही मिला तो हम रोटी ही खा लेंगे और दाल नही मिली तो सब्जी से कम चल जाएगा

आज जरुरत है तो मुष्लिम समाज को अपनी परम्परा को बदलने की , जरुरी नही है की सदियों पुरानी परम्परा को आज भी उसी तरह से चलायें, समय के हिसाब से बहुत कुछ बदल गया हैकिसी ज़माने में मुष्लिम धर्म में फ़िल्म और फोटो पर प्रतिबन्ध था मगर आज अफगानिस्तान को छोड़कर के लग भग हर देश का मुसलमान अपनी फोटो रखता है और फ़िल्म देखता हैबुर्के का रिवाज भी बहुत कम प्रचलन में देखा जाता है



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