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Sunday, December 6, 2009

आखिर कलंक मिट ही गया.

आखिर उसका वजूद ख़त्म हो ही गया कई सौ सालो से लोगे के सीने पर सांप लोट रहा था , करते भी क्यों नही हमारी चीज तो हमारी ही रहेगी , आज १८ साल पुरे हो गए लोगो को अपनी क़ुरबानी दिए हुए , जाने कितने गुमनामी मैं शहीद हो गए और जाने कितनो को चिता की लकड़ी भी नसीब नही हुई , आज का दिन बहुत ही शुभ दिन है उन कार सेवको की क़ुरबानी को याद करने के लिए, जिन्होंने अपनी परवाह करते हुए उस कलंक को ही मिटा दिया जिसे लेकर देश की जनता और देश की सरकार पिछले कई दसको से परेशान चल रही थीपरेशानी का सबसे बड़ा कारन भी हमारे देश की ही जनता है, लेकिन क्या कर सकते है, वही पुराना जुमला असहयोग , तुम्हारा हमारा , प्यार से कह कह करके थक गए तो क्या करते

मेरे कुछ देश वाशी यों को काफी तकलीफ हुई बाबरी मस्जीद गिर जाने से
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