मेरा अपना कुत्ता आज कल इतना जोर-जोर से भौंकता है की बस पूछिये मत मेरी नजर बार- बार अपने दरवाजे पर जाती है की कोई आ गया क्या। कुत्ते तो भौकने के लिए ही होते हैं मगर आज कल जो मेरा कुत्ता भौंक रहा है उस से मेरी परेशानी बढ जाती है और माथे पर से पसीने की नदी बहने लगती है। हमेशा डर लगा रहता है की अब कौन आ गया, फिर सोचता हूँ की मैंने तो आज किसी को बुलाया भी नही था । लेकिन क्या करे डर तो डर है । खैर ? । दिक्कत एक और है की मेरे घर के सामने से सड़क जाती है और जब सड़क जायेगी तो उस पर लोग भी जायेंगे। कुछ पैदल चलने वाले जब मेरे घर के बिल्कुल करीब से चलते है तो फिर मेरे कुत्ते को दिक्कत होती है और भौकना चालू कर देता है और फिर क्या, मेरे माथे पर पसीने की लकीर।
मैं आजकल सचमुच बहुत बड़ी परेशानी से गुजर रहा हूँ , परेशानी भी येसी की किसी को क्या बताई जाय लेकिन क्या करूँ टेंशन लेते लेते सर मैं दर्द हो गया तो सोचा की कुछ लिखा जाय। इसीलिए बैठ गया कुर्सी खिंच कर के कम्पूटर जी के सामने। दरअसल दिक्कत ये है की मुझे ३५ से ४० हजार रूपया किसी को देना है और उसी को आजकल -आजकल करते -करते मेरा दिमाग ख़राब हो गया है की क्या करूँ , जिस कंपनी में मैं नौकरी कर रहा हूँ उस कंपनी में मेरी सैलरी ठीक ठाक है, मगर मेरे लाला जी की हालत ठीक नही है इस लिए उन्होंने मेरी तीन महीने की पगार रोक रखी है, मागने पर कहते हैं बस बेटा कुछ दिन और रुक जा।
बस इसी टेंशन में मैं भी लोगो को टेंशन दिए जा रहा हूँ आजकल करके , और उसी चक्कर में जब मेरा कुत्ता भौंकता है तो मेरी नजर मेरे दरवाजे पर जाती है और आ जाती है पसीने की लकीर.
Tuesday, June 30, 2009
Monday, May 25, 2009
हस्पताल या अस्पताल
राम राम जी
लोग रोज -रोज कोई ना कोई मुद्दा ले कर के बैठ जाते हें बहस करने के लिए, आज मैं आप सभी लेखक बंधू और पाठक बंधू से अपने इस बिषय पर आपके विचार की उम्मीद रखता हूँ /
हस्पताल या अस्पताल इसमे से सही शब्द क्या है , ये सबको पता है की ये तो सिर्फ़ उच्चारण की गलती है, लेकिन उच्चारण भी क्या , हम जब भी अपनी मात्र भाषा के आलावा कोई और भाषा बोलेंगे और उस भाषा में हम अगर पुरी तरह से निपुड नही है तो उच्चारण तो ग़लत होगा ही/ और इसी ग़लत उच्चारण की वजह से हम भारतीयों को भारत की जगह इंडियन और हिंदू नाम मिला है/ आज से लगभग दो हज़ार साल पहले जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तो उस समय उसके सेना और उसके अधिकारिओं के द्वारा सिन्धु नदी का उच्चारण सिन्धु ना करके इन्दुस किया गया जिस से उस दौरान बिदेशियों के द्वारा हमें इन्दुस या इंडियन नाम मिला, आज भी अगर आप सिन्धु नदी या सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में कंही पड़ेंगे तो इंग्लिश में उसका नाम इन्दुस (INDUS RIVER) ही मिलेगा/
फारसियों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो वो भी सबसे पहले सिन्धु नदी के किनारे आकर के रुके और सिन्धु नदी को उन्होंने हिंदू नदी कहा और सिन्धु नदी के इस तरफ़ रहने वालो को हिंदू कहा / इस तरह से उच्चारण बदलते -बदलते आज हम भारतीय एक जातिसूचक शब्द में बाँध कर के रह गए/
लोग रोज -रोज कोई ना कोई मुद्दा ले कर के बैठ जाते हें बहस करने के लिए, आज मैं आप सभी लेखक बंधू और पाठक बंधू से अपने इस बिषय पर आपके विचार की उम्मीद रखता हूँ /
हस्पताल या अस्पताल इसमे से सही शब्द क्या है , ये सबको पता है की ये तो सिर्फ़ उच्चारण की गलती है, लेकिन उच्चारण भी क्या , हम जब भी अपनी मात्र भाषा के आलावा कोई और भाषा बोलेंगे और उस भाषा में हम अगर पुरी तरह से निपुड नही है तो उच्चारण तो ग़लत होगा ही/ और इसी ग़लत उच्चारण की वजह से हम भारतीयों को भारत की जगह इंडियन और हिंदू नाम मिला है/ आज से लगभग दो हज़ार साल पहले जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तो उस समय उसके सेना और उसके अधिकारिओं के द्वारा सिन्धु नदी का उच्चारण सिन्धु ना करके इन्दुस किया गया जिस से उस दौरान बिदेशियों के द्वारा हमें इन्दुस या इंडियन नाम मिला, आज भी अगर आप सिन्धु नदी या सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में कंही पड़ेंगे तो इंग्लिश में उसका नाम इन्दुस (INDUS RIVER) ही मिलेगा/
फारसियों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो वो भी सबसे पहले सिन्धु नदी के किनारे आकर के रुके और सिन्धु नदी को उन्होंने हिंदू नदी कहा और सिन्धु नदी के इस तरफ़ रहने वालो को हिंदू कहा / इस तरह से उच्चारण बदलते -बदलते आज हम भारतीय एक जातिसूचक शब्द में बाँध कर के रह गए/
Sunday, May 24, 2009
संगीता पुरी जी और उनके पाठको के लिए
मेरा ये लेख संगीता सूरी जी के ब्लॉग : क्या पाठक ज्योतिष की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने में मेरी मदद करेंगे ?????
बहुत बढ़िया लिखा है आपने , मेरे नजर में तो साइंस और ज्योतिष दोनों अपनी अपनी जगह पर उचित हैं,
साइंस आज का पढ़ा जाने वाला लोकप्रिय सुब्जेक्ट है और ज्योतिष को लोग पार्ट टाइम ले रहे है ज्योतिष पर ज्यादा ध्यान दे तो सचमुच ज्योतिष आगे निकले जाएगा।
संगीता जी ज्योतिष को सिद्ध करने की जरुरत नही है, ज्योतिष तो खुद मैं एक पेर्फक्ट सुब्जेक्ट है / जिसने पुरी दुनिया को जानकारी दिया है/ हमारे देश के पूर्वजो ने आज से हजारो साल पहले इतना गहन आध्यनकिया था, जिसका फायदा आज पुरी दुनिया उठा रही है, सूर्य की पृथ्वी से दुरी, पृथ्वी कितने चक्कर पुरे साल मैं लगाती है , चंद्रमा और तारो का रहस्य, कब कौन सा मौषम , दिशावों की जानकारी , मैथ की jankari और बहुत से एक्साम्प्ले है जो ज्योतिष को सही बताएँगे ,
क्या साइंस बता पायेगा की हमारे हाथ और पैर की अंगुली मैं सिर्फ़ तीन पार्ट क्यों होते हैं और हमारे हाथ मैं भी तीन पार्ट क्यों होते हैं और हमारे पुरे शरीर पर भी तीन पार्ट क्यों होते हैं /
आप सबको अच्छी तरह से पता है की हमारा देश ज्योतिष पर ही टिका हुआ है , हमारे देश नो जो अपनी सभ्यता हजारो सालो से बचा रखी वो भी ज्योतिष की देन है
बहुत बढ़िया लिखा है आपने , मेरे नजर में तो साइंस और ज्योतिष दोनों अपनी अपनी जगह पर उचित हैं,
साइंस आज का पढ़ा जाने वाला लोकप्रिय सुब्जेक्ट है और ज्योतिष को लोग पार्ट टाइम ले रहे है ज्योतिष पर ज्यादा ध्यान दे तो सचमुच ज्योतिष आगे निकले जाएगा।
संगीता जी ज्योतिष को सिद्ध करने की जरुरत नही है, ज्योतिष तो खुद मैं एक पेर्फक्ट सुब्जेक्ट है / जिसने पुरी दुनिया को जानकारी दिया है/ हमारे देश के पूर्वजो ने आज से हजारो साल पहले इतना गहन आध्यनकिया था, जिसका फायदा आज पुरी दुनिया उठा रही है, सूर्य की पृथ्वी से दुरी, पृथ्वी कितने चक्कर पुरे साल मैं लगाती है , चंद्रमा और तारो का रहस्य, कब कौन सा मौषम , दिशावों की जानकारी , मैथ की jankari और बहुत से एक्साम्प्ले है जो ज्योतिष को सही बताएँगे ,
क्या साइंस बता पायेगा की हमारे हाथ और पैर की अंगुली मैं सिर्फ़ तीन पार्ट क्यों होते हैं और हमारे हाथ मैं भी तीन पार्ट क्यों होते हैं और हमारे पुरे शरीर पर भी तीन पार्ट क्यों होते हैं /
आप सबको अच्छी तरह से पता है की हमारा देश ज्योतिष पर ही टिका हुआ है , हमारे देश नो जो अपनी सभ्यता हजारो सालो से बचा रखी वो भी ज्योतिष की देन है
रेल गाड़ी में मुफ्त सफर- छात्रो के लिए
ये ख़बर बहुत अच्छी तो नही हैं मगर फिर भी ठीक है, क्योंकि छात्र तो पहले से ही मुफ्त सफर का आनंद उठाते रहे हैं / आज तक कौन से छात्र ने टिकेट ख़रीदा है, अगर ख़रीदा भी है तो सिर्फ़ जुर्माने से बचने के लिए और वो भी पुरे साल में एक बार या दो बार। लेकिन फिर भी ममता जी का कदम ठीक है कम से कम छात्रो को सरकारी लाइसेंस तो मिल ही जाएगा/ और देखा जाए तो ममता जी के इस कदम से रेल मंत्रालय को कोई नुकसान तो होने वाला है नही/ पहले ही कौन सा टिकेट खरीदते थे,
लालू जी को जरुर अस्चर्या होगा की घाटे में जा रही ट्रेन को मैंने ही तो फायदा ला कर के दिखाया , ये वाला आइडिया कयों नही आया /
खैर मेरे छात्र बंदू अ़ब मजे से टेंशन फ्री हो कर के यात्रा करो / मुझे तो अफसोश इस बात का है की हमारे ज़माने में एसा मंत्री क्यों नही हुआ /
लालू जी को जरुर अस्चर्या होगा की घाटे में जा रही ट्रेन को मैंने ही तो फायदा ला कर के दिखाया , ये वाला आइडिया कयों नही आया /
खैर मेरे छात्र बंदू अ़ब मजे से टेंशन फ्री हो कर के यात्रा करो / मुझे तो अफसोश इस बात का है की हमारे ज़माने में एसा मंत्री क्यों नही हुआ /
Monday, April 27, 2009
ये क्या हो रहा है आज कल
माफ़ करना मेरे दोस्तों और मेरे बुजुर्गो ये क्या हो गया आज कल के लोगो को, सब के सब अपनी -अपनी ले कर के बैठ गए, कोई जूतों को लेकर के बैठा है तो कोई पी म को ले लेकर के और तो और कुछ लोग तो मोदी के पीछे भाग रहे हैं तो कुछ लोग मायावती के, कोई सरदार जी के उपर जूता मार रहा है तो कोई मोहम्मद जिन्ना के शुभ चिन्तक के उपर जूता फैंकने की कोशिश मैं लगा हैं,
मेरे साथिओं जरा देश के बारे मैं भी तो सोचो, देश की आबादी के बारे मैं सोचो, देश के कानून के बारे मैं सोचो, देश की जनता के बारे मैं सोचो, देश मैं बढरहे प्रदुषण के बारे मैं सोचो, जरा अपने और अपने परिवार के बारे मैं सोचो।
धन्यवाद
मेरा नया ब्लॉग है : www.pollutioncontrolsociety.blogspot.com
मेरे साथिओं जरा देश के बारे मैं भी तो सोचो, देश की आबादी के बारे मैं सोचो, देश के कानून के बारे मैं सोचो, देश की जनता के बारे मैं सोचो, देश मैं बढरहे प्रदुषण के बारे मैं सोचो, जरा अपने और अपने परिवार के बारे मैं सोचो।
धन्यवाद
मेरा नया ब्लॉग है : www.pollutioncontrolsociety.blogspot.com
Tuesday, February 24, 2009
आस्था और गन्दगी
मेरे प्रिय मित्रगड़ नमस्कार,
कल शिव रात्रि के पर्व पर मैं हरिद्वार में था, वंहा पर शिव भक्तो की अपार भीड़ देख कर मन बहुत खुश हुआ की देखो लोग कितने धार्मिक होते जा रहे हैं, हर तरफ से हर हर महादेव - हर हर गंगे की ध्वनि से हरिद्वार का वातावरण कितना मनोरम सा लग रहा था, उस पवित्र वातावरण में मैं भी अपने दोस्तों के साथ गंगा जी के किनारे हर की पौडी पर शिवमय हुआ घूम रहा था तभी मैंने देखा की मेरे सामने एक खाली शराब की बोतल पड़ी हुई है, मैंने मन ही मन सोचा की ये क्या इधर भी, तभी कुछ लोग एक आदमी को पिटते हुए पुलिश चौकी की तरफ़ ले कर जा रहे थे मैंने उन लोगो से पूछा की भाई इसे क्यों मर रहे हो तो उनमें से एक आदमी ने बताया की ये एक तो दारू पी रखी है और दुसरे की ये आदमी एक छोटी सी बच्ची के बिस्तर में जा कर के सोने की कोशिश कर रहा था। मेरा तो दिमाग ख़राब हो गया और माता गंगा की और देख कर के कहा की हे माता ये क्या हो रहा hai। खैर इन सब बातो को अनसुना कर के जब मैं आगे बढ़ा तो मेरे दोस्तों ने कहा की चलो हम शौच आदि से फ्री हौले , और फिर मैं अपने दोस्तों के साथ सुलभ शौचालय की तरफ़ चल दिया, अन्दर लम्बी सी लाइन लगी हुई थी मैं भी उस लाइन का एक hइस्सा बन कर के खड़ा हो गया , जब मेरा नम्बर आया तो मैं भी फ्रेश होने के लिए अन्दर गया । कहते हैं की शौचालय मैं दिमाग और अच्छी तरह से चलता है क्योंकि शौचालय सिर्फ़ शौचालय ही नही बल्कि सोच आलय भी है। अन्दर मैंअपना समय सिर्फ़ ये सोचने पर लगाया की इस शौचालय की गन्दगी गंगा जी मैं इसी जगह पर मिला दी जाए गी या कुछ दूर के बाद।
आखिर क्या हमारे पास और कोई तरीका नही है जिससे की हम इस गन्दगी को इस आस्था से दूर रख सके
मेरे पास तरीका हैं क्या आप लोग मेरा साथ देंगे
कल शिव रात्रि के पर्व पर मैं हरिद्वार में था, वंहा पर शिव भक्तो की अपार भीड़ देख कर मन बहुत खुश हुआ की देखो लोग कितने धार्मिक होते जा रहे हैं, हर तरफ से हर हर महादेव - हर हर गंगे की ध्वनि से हरिद्वार का वातावरण कितना मनोरम सा लग रहा था, उस पवित्र वातावरण में मैं भी अपने दोस्तों के साथ गंगा जी के किनारे हर की पौडी पर शिवमय हुआ घूम रहा था तभी मैंने देखा की मेरे सामने एक खाली शराब की बोतल पड़ी हुई है, मैंने मन ही मन सोचा की ये क्या इधर भी, तभी कुछ लोग एक आदमी को पिटते हुए पुलिश चौकी की तरफ़ ले कर जा रहे थे मैंने उन लोगो से पूछा की भाई इसे क्यों मर रहे हो तो उनमें से एक आदमी ने बताया की ये एक तो दारू पी रखी है और दुसरे की ये आदमी एक छोटी सी बच्ची के बिस्तर में जा कर के सोने की कोशिश कर रहा था। मेरा तो दिमाग ख़राब हो गया और माता गंगा की और देख कर के कहा की हे माता ये क्या हो रहा hai। खैर इन सब बातो को अनसुना कर के जब मैं आगे बढ़ा तो मेरे दोस्तों ने कहा की चलो हम शौच आदि से फ्री हौले , और फिर मैं अपने दोस्तों के साथ सुलभ शौचालय की तरफ़ चल दिया, अन्दर लम्बी सी लाइन लगी हुई थी मैं भी उस लाइन का एक hइस्सा बन कर के खड़ा हो गया , जब मेरा नम्बर आया तो मैं भी फ्रेश होने के लिए अन्दर गया । कहते हैं की शौचालय मैं दिमाग और अच्छी तरह से चलता है क्योंकि शौचालय सिर्फ़ शौचालय ही नही बल्कि सोच आलय भी है। अन्दर मैंअपना समय सिर्फ़ ये सोचने पर लगाया की इस शौचालय की गन्दगी गंगा जी मैं इसी जगह पर मिला दी जाए गी या कुछ दूर के बाद।
आखिर क्या हमारे पास और कोई तरीका नही है जिससे की हम इस गन्दगी को इस आस्था से दूर रख सके
मेरे पास तरीका हैं क्या आप लोग मेरा साथ देंगे
Saturday, February 7, 2009
नेताजी सावधान ****** जूता आ रहा है
नेताजी सावधान ****** जूता आ रहा है
मेरे देश के बुजुर्ग और बुद्धजीवी नेता गड नमस्कार।
बचपन मैं एक फ़िल्म देखी थी , जिसमे खलनायक अपने एक चमचे, से एक ऑफिसर को पटाने के लिए कहता है की उस ऑफिसर को चाँदी का जूता मारो और फिर भी काम न बने तो उसे सोने का जूता मारो ..काम बनेगा /
लेकिन ये क्या इराक वालों ने तो चमडे के जूते से ही काम काम चलाना चालू कर दिया। जूता और जूता मारने वाला दोनों ही दुनिया मे प्रसिद्ध हो गए । जूता कई लोगो को अमीर बना गया ।
जूते तेरे क्या नखरे
अभी कुछ दिन पहले जूता चीन मैं भी चला और आज उस जूते की तारीफ मैं कुछ कसीदे यूरोप के एक छोटे से देश मैं भी पढ़े गए ।
तो मेरे प्रिय देश के नेताजी और मंत्री महोदय मैं आपको सलाह देना चाहूँगा की पब्लिक तो पब्लिक है कम से कम आप तो सावधान रहे । आगे से अगर आप कभी भी प्रेस मीटिंग रखते है तो कृपया ध्यान से अपने सिक्यूरिटी वालों से कह कर के सभी पत्रकार बंधू लोगो का जूता बाहर ही निकलवा ले , क्या पता कौन किधर से जूता चला दे कौनो भरोसा है आज कल के ज़माने का और तो और चुनाव सर पर है।
मेरे देश के बुजुर्ग और बुद्धजीवी नेता गड नमस्कार।
बचपन मैं एक फ़िल्म देखी थी , जिसमे खलनायक अपने एक चमचे, से एक ऑफिसर को पटाने के लिए कहता है की उस ऑफिसर को चाँदी का जूता मारो और फिर भी काम न बने तो उसे सोने का जूता मारो ..काम बनेगा /
लेकिन ये क्या इराक वालों ने तो चमडे के जूते से ही काम काम चलाना चालू कर दिया। जूता और जूता मारने वाला दोनों ही दुनिया मे प्रसिद्ध हो गए । जूता कई लोगो को अमीर बना गया ।
जूते तेरे क्या नखरे
अभी कुछ दिन पहले जूता चीन मैं भी चला और आज उस जूते की तारीफ मैं कुछ कसीदे यूरोप के एक छोटे से देश मैं भी पढ़े गए ।
तो मेरे प्रिय देश के नेताजी और मंत्री महोदय मैं आपको सलाह देना चाहूँगा की पब्लिक तो पब्लिक है कम से कम आप तो सावधान रहे । आगे से अगर आप कभी भी प्रेस मीटिंग रखते है तो कृपया ध्यान से अपने सिक्यूरिटी वालों से कह कर के सभी पत्रकार बंधू लोगो का जूता बाहर ही निकलवा ले , क्या पता कौन किधर से जूता चला दे कौनो भरोसा है आज कल के ज़माने का और तो और चुनाव सर पर है।
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