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Tuesday, February 24, 2009

आस्था और गन्दगी

मेरे प्रिय मित्रगड़ नमस्कार,

कल शिव रात्रि के पर्व पर मैं हरिद्वार में था, वंहा पर शिव भक्तो की अपार भीड़ देख कर मन बहुत खुश हुआ की देखो लोग कितने धार्मिक होते जा रहे हैं, हर तरफ से हर हर महादेव - हर हर गंगे की ध्वनि से हरिद्वार का वातावरण कितना मनोरम सा लग रहा था, उस पवित्र वातावरण में मैं भी अपने दोस्तों के साथ गंगा जी के किनारे हर की पौडी पर शिवमय हुआ घूम रहा था तभी मैंने देखा की मेरे सामने एक खाली शराब की बोतल पड़ी हुई है, मैंने मन ही मन सोचा की ये क्या इधर भी, तभी कुछ लोग एक आदमी को पिटते हुए पुलिश चौकी की तरफ़ ले कर जा रहे थे मैंने उन लोगो से पूछा की भाई इसे क्यों मर रहे हो तो उनमें से एक आदमी ने बताया की ये एक तो दारू पी रखी है और दुसरे की ये आदमी एक छोटी सी बच्ची के बिस्तर में जा कर के सोने की कोशिश कर रहा था। मेरा तो दिमाग ख़राब हो गया और माता गंगा की और देख कर के कहा की हे माता ये क्या हो रहा hai। खैर इन सब बातो को अनसुना कर के जब मैं आगे बढ़ा तो मेरे दोस्तों ने कहा की चलो हम शौच आदि से फ्री हौले , और फिर मैं अपने दोस्तों के साथ सुलभ शौचालय की तरफ़ चल दिया, अन्दर लम्बी सी लाइन लगी हुई थी मैं भी उस लाइन का एक hइस्सा बन कर के खड़ा हो गया , जब मेरा नम्बर आया तो मैं भी फ्रेश होने के लिए अन्दर गया । कहते हैं की शौचालय मैं दिमाग और अच्छी तरह से चलता है क्योंकि शौचालय सिर्फ़ शौचालय ही नही बल्कि सोच आलय भी है। अन्दर मैंअपना समय सिर्फ़ ये सोचने पर लगाया की इस शौचालय की गन्दगी गंगा जी मैं इसी जगह पर मिला दी जाए गी या कुछ दूर के बाद।
आखिर क्या हमारे पास और कोई तरीका नही है जिससे की हम इस गन्दगी को इस आस्था से दूर रख सके

मेरे पास तरीका हैं क्या आप लोग मेरा साथ देंगे
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