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Friday, March 18, 2011

होली और मेरा गाँव. -- तारकेश्वर गिरी.

जैसे जैसे होली नजदीक आती जा रही रही वैसे वैसे बचपन कि यादे भी आ रही हैं. वो दिन जब होलिका दहन के लिए उपले और लकड़ी चुरा-चुरा के इक्कठा करना, ईस बात कि होड़ लगी रहती थी कि किस गोंव कि होलिका कि आग सबसे उपर जाएगी.

होलिका दहन कि शाम को दादी और मेरी माता जी हम सब भाई बहनों को उबटन (कच्ची सरसों पीस कर ) कर के पुरे शरीर पर मालिश करती थी, और जो मैल शरीर से निकलती थी उसे होलिका में डाल दिया जाता था. उस समय तो ईस बात क मतलब पता नहीं था, मगर आज लगता हैं कि ठण्ड के मौसम में सही तरीके से शरीर कि सफाई नहीं हो पाती थी, इसलिए होली के (गर्मियों कि शुरुवात) मौसम में उबटन से मालिश कि जाती थी.

होलिका दहन से पहले भोजपुरी गीत गाती पुरे गाँव कि महिलाये और आग लगाते समय होलिका कि जय करते हुए गाँव के लोग , सोचता हूँ तो बस, सोच कर के ही आनंद आ जाता हैं.

आधी रात तक माता जी और दादी जी के साथ पकवान बनाना, और सुबह उठते ही बच्चो कि भीड़ में शामिल हो जाना और जोर से " कबीरा सा रा रा रा रा "

बाकि कल ...............................
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