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Monday, July 12, 2010

२७ हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई है कुव्वत - उल इस्लाम मस्जिद - तारकेश्वर गिरी.





दिल्ली के पास महरौली मैं स्थित ये मस्जिद क़ुतुब मीनार के प्रांगन मैं स्थित है. जिसके अन्दर घुसने से पहले ही दरवाजे पर दिल्ली सरकार का सूचना बोर्ड लगा हुआ है, कि ये मस्जिद २७ हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़ कर के बनाई गई है. जब आप इस मंदिर (मस्जिद) मैं लगे हुए खम्बो को देखेंगे तो तुरंत पता चल जायेगा, उन पर उकेरी हुई देवी और देवातावो कि परतिमाये और घंटियाँ ये चिल्ला - चिल्ला के कहती हैं कि ये मस्जिद नहीं बल्कि एक वेधशाला थी. देवी और देवातावो कि प्रतिमावो को ऊपर से छील दिया गया है.



पश्चिम से आये मुस्लिम लड़ाके , अपनी जीत दर्ज करने के बाद अपना गुस्सा हिन्दू मंदिरों पर उतारते थे. हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर के वंहा पर किसी न किसी प्रमुख मुस्लिम व्यक्ति कि कब्र बना देना उनकी आदत थी, इस काम मैं उन्हें क्या आनंद आता था ?........पता नहीं.




दिल्ली का इतिहास महाभारत काल से विद्यमान है, सबसे पहले पांड्वो ने अपनी राजधानी २५०० ई. पु. मैं बनाई, जिसका नाम उन्होंने ने इन्द्रप्रस्थ रखा, इन्द्रप्रस्थ से भी पहले इसका नाम खंडवाप्रस्थ था. ७३६ ए डी से लेकर के ११९२ तक तोमर-चौहान वंस के राजावो ने राज्य किया.


उसके बाद १२०६-१२९० तक माम्लुक्स वंस के लोगो ने दिल्ली पर राज्य किया, खिलजी वंस का राज्य १२९०- १३२० तक चला, फिर आया तुगलकी फरमान वालो का नम्बर जिन्होंने १३२०-१४१३ तक दिल्ली पर राज्य किया, उसके बाद सैयेद बंधू ने भी अपनी किश्मत १४१४ से लेकर १४५१ तक आजमाई. फिर आये श्रीमान लोधी वंस के शासक जिन्होंने लोधी वंस के दीपक को १४५१ से लेकर के १५२६ तक जलाया. लम्बा समय निकला मुग़ल शासको ने १५२६ से लेकर के १८५७ तक उसके बाद शुरू हुआ भारत कि आज़ादी का दौर . अंग्रेजो ने भी १८५७ से १९४७ तक भारत कि तरक्की मैं पूरा योगदान दिया. और अब तो बाबा आक्टोपस ही बताएँगे कि दिल्ली मैं दीक्षित और इटालियन वंस का साम्राज्य कब चलेगा।


महरौली मैं मीनार बनाने के श्रेय पृथ्वीराज चौहान को जाता है, मीनार से पहले वंहा पर बहुत ही सुन्दर सा किला और किले के पास अतिसुन्दर सी वेधशाला (ज्योतिष गड़ना) के लिए बनी थी. महाराजा पृथ्वी राज चौहान ने उसी प्रांगन मैं मीनार बनवाने काम शुरू किया. लेकिन काम ख़त्म होने से पहले ही ११९२ मैं गजनी के हाथो हुई हार से बाकि काम रुक गया और श्रेया मिला कुतुब्दीन एबक को.

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