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Monday, June 7, 2010

प्यार का सन्देश -मौलाना वहीदुद्दीन खान - तारकेश्वर गिरी


इस्लाम एक ऐसा धर्म , एक ऐसा शब्द जिसको सुनते ही बाकि धर्मो के लोगो का दिमाग भन्ना उठता है उसकी वजह भी शायद जायज ही है। क्योंकि लोगो ने इसी तरह की अफवाह उड़ा रखी है। और लोगो में भी कोई बहार के नहीं , वो लोग भी इस्लाम को ही मानने वाले है। मगर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं मुझे तो नहीं पता।



रही बात मेरी तो , तो में हमेशा उदार वादी सोच में भरोसा रखता हूँ, और सबको साथ ले कर के चलने में भरोसा भी रखता हूँ। और उसी का नतीजा है की दो विरोधी सोच रखने वाले आज साथ-साथ हैं।


परसों यानि की ०५ जून २०१० को दोपहर में श्रीमान अनवर जमाल जी का मेरे पास फ़ोन आता है , और उन्होंने मुझे फ़ोन पर ही एक इस्लामिक विद्वान से मिलवाने का आमंत्रण दिया, में भी ठहरा घुमक्कड़ , तुरंत ही तैयार हो गया । अनवर जी ने बताया की हम सुबह के ७:३० बजे दिल्ली में पहुँच कर के आप को बता देंगे की हमें किधर मिलना है। में अगले दिन सुबह ५ बजे ही उठा करके तैयार हो गया और सुबह के ७:३० बजे का इंतजार करने लगा, लगभग ७ बजे के आसपास अनवर जमाल जी का फ़ोन आया की हम सुबह के ९:३० बजे प्रीत विहार में मिलेंगे।


खैर में तय समय से लगभग २० मिनट की देरी से प्रीत विहार पहुंचा। वंहा जाकर के जैसे ही में अपनी गाड़ी से उतरा तो सबसे पहले श्रीमान शाहनवाज जी अपनी गाड़ी से उतारे , उसके बाद श्रीमान डॉ अयाज़ जी नीचे उतारे और उनके पीछे श्रीमान मास्टर अनवार, और सबसे पीछे उतरे मेरे सबसे प्रिय मित्र श्रीमान डॉ अनवार जमाल महोदय। सबका एक दुसरे से परिचय हुआ उसके बाद सभी लोग मेरी गाड़ी में बैठ करके निजामुद्दीन की तरफ चल दिए । पुरे रास्ते एक दुसरे के बारे में बतियाते हुए कब हम लोग निजामुद्दीन पहुँच गए पता ही नहीं चला। सब उस दौरान बहुत ही खुश थे किसी के भी दिमाग में किसी भी तरह का कोई भी गला -शिकवा नहीं बल्कि सबको आपस में मिलने की ख़ुशी थी । वो ऐसे लोग हमेश एक दुसरे के खिलाफ लिकते रहे हो।


बाकि कल मेरा इंतजार करियेगा , आगे और भी मजेदार बाते आपको बताऊंगा। अगर आप लोगो को समय मिले तो इस लिंक को जरुर देखिएगा।


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