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Saturday, July 4, 2009

राष्ट्रपति पुरस्कार का एक और हक़दार

पिछले दिनों चित्रकूट मैं पुलिश और डाकू घनश्याम के बीच पुरे तीन दिनों तक घमाशान गोलीबारी होती रही नतीजा कुछ पुलिश ऑफिसर के साथ कुछ जवान भी मारे गए, डाकू घनश्याम तो मारा गया लेकिन पीछे -पीछे कई लोगो को शहीद भी कर गया । तब उत्तर प्रदेश पुलिस को लगा की ये थी असली मुडभेड लेकिन जो देहरादून में हुआ वो उत्तराखंड पुलिस के लिए डूब कर मर जाने जैसा है, एक लड़का जो की ऍम बी ये करने के बाद देहरादून जाता है नौकरी खोजने के लिए उसको पुलिस जंगल में ले जाकर ६ की ६ गोलियां उसके सीने में उतार देती है और बाद में ये सफाई देती है की उसने पुलिस पर गोलियां चलाई, बेचारी पुलिस और करे क्या तरक्की पाने के लिए तो कुछ ना कुछ तो करना ही था सो कर डाला। कर दिया एक और घर को सुनसान ।

क्या ऐसे पुलिस ऑफिसर के लिए कोई कानून नही है जो इनको सबक सिखा सके की फर्जी एन्कोउन्टर के बाद क्या होता है।
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