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Wednesday, November 3, 2010

देखा हैं हमने - पत्थर को रेत मैं बदलते हुए- तारकेश्वर गिरी.

बहुत सुनी हैं कहानियां बहुत पढ़ी हैं कवितायेँ ,
बदला जुग -बदला जमाना
देखा हैं हमने भी पत्थर को रेत में बदलते हुए।


अटल, अविरम्ब, स्थिर एक जड़ सा सदियों से
घमंडी, बिना झुके एक ही जगह पड़ा।
देखा हैं हमने भी पत्थर को रेत में बदलते हुए।


छोटी सी बुँदे बारिश कि ,हलकी सी हवा पहाड़ो कि,
साथ मिलती हैं जब, तो प्यार से कहती हैं,
देखा हैं हमने भी पत्थर को रेत में बदलते हुए।


तुम्हारी क्या औकात हैं ये अजनबी , तुम तो रेत भी नहीं बन सकते,
चार गज जमीन या चार कुन्तल लकड़ियाँ,
देखा हैं हमने भी पत्थर को रेत में बदलते हुए।
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