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Wednesday, June 23, 2010

औरत गुलाम क्यों - तारकेश्वर गिरी.

नारी से पुरुष है तो पुरुष से नारी. दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे हैं. लेकिन ये जरुरी है की पुरुष अपनी मर्यादा में ही रहे और नारी अपनी मर्यादा में. निर्मला जी की बातो से सहमत हूँ की कंही न कंही औरत समाज की स्थिति दयनीय है और उसका जिम्मेदार पुरुष ही है . लेकिन वोही पुरुष समाज दूसरी तरफ महिलावो को समाज से जोड़ने में मदद भी कर रहा है.

अगर में एक माँ का बेटा हूँ तो दो बहनों का भाई भी हूँ और एक बेटी का पिता भी हूँ तो साथ मैं पति की भूमिका मैं भी . ये मेरी जिम्मेदारी है. ठीक उसी तरह से जिम्मेदारी महिलावो की भी है.

नारी कभी भी किसी की गुलाम नहीं रही है , ना ही कभी रहेगी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं की नारी के अन्दर सारे गुण पुरुष की तरह हो जाय.

अभी पंजाब का एक वाकया सबको पता हो गा , जंहा पर दो लड़कियों ने आपस मैं शादी की है. इस शादी या आज़ादी का मतलब क्या है. क्या इस से नारी या पुरुष का चरित्र साफ होता है, शायद नहीं. जिंदगी की शुरुवात सिर्फ नारी या सिर्फ पुरुष से संभव नहीं है दोनों का साथ जरुरी है. दोनों के बीच आपसी तालमेल जरुरी है.

भारतीय समाज की तुलना अगर अरबियन समाज से या यूरोपियन समाज से की जाय तो पता चलता है की भारत के अन्दर महिलावो की स्थिति बाकि समाज से काफी अलग और मजबूत है.हिंदुस्तान मैं कंही ना कंही औरत की महत्वता को समझते हुए ऋषि -मुनियों ने वेदों मैं काफी ऊँचा स्थान दिया है.

यूरोपियन और अरबियन समाज मैं औरत सिर्फ बच्चा पैदा करने का और मनोरंजन का साधन मात्र है. यूरोपियन समाज मैं किस बच्चे का पिता कौन है , ये उस बच्चे की माँ को भी नहीं पता चल पता. यूरोपियन समाज की औरतो ने एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए अगर अपनी जमीन तैयार की है, तो उसकी वजह मात्र शिक्षा है. लेकिन उनकी शिक्षा के आगे उनका समाज आड़े आ जाता है और एक नई बीमारी जो की कैरिअर के रूप मैं है.

भारतीय समाज के अन्दर शादी -विवाह नाम की मजबूत व्यस्था और मजबूत सामाजिक ढांचा होने की वजह से उपरोक्त नौबत नहीं आती है। लेकिन अब भारती नारी समाज को भी यूरोपियन तरीके की आज़ादी रास आने लगी है.

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