Saturday, May 14, 2011

इस्लाम-----तालिबान-----और इंसाफ.

इस्लाम धर्म के अन्दर न्याय कि प्रक्रिया बहुत ही तेज हैं, तुरंत मुकदमा और तुरंत फैसला और तुरंत ही न्याय.

घटना ईरान कि हैं. ईरान में एक युवक ने एक महिला कि आंख में तेजाब डाल दिया जिसकी वजह से महिला कि दोनों आंखे ख़राब हो गई. ईरान कि अदालत ने एक बहुत ही नासमझी भरा (तालिबानी और इस्लामिक दबाव) फैसला दिया कि उस युवक कि दोनों आँखों में पीड़ित महिला तेजाब कि दस बूंद डालेगी , जिससे कि अपराधी कि भी दोनों आंखे सदा के लिए ख़राब हो जाये.

नासमझी इसलिए कि आखिर इस्लामिक अदालत और अपराधी के बीच में अंतर क्या रह गया. अगर एक अपराधी चूँकि वो अपराध कर रहा हैं इसलिए ईस तरह का कदम उठाता हैं, मगर अदालत तो एक सामाजिक और स्वतंत्र न्यायिक व्यस्था हैं जो सभी वर्गों को साथ ले कर के चलती हैं. उसको ये भी देखना चाहिए कि आखिर अपराध हुआ क्यों.

मैंने बहुत लोगो कि बात सुनी लेकिन किसी ने भी अपनी सही राय नहीं दी. कोई कहता हैं कि फैसला सही हैं और कोई कहता हैं कि फैसला गलत हैं,

उस ईरानी महिला से मेरी भी हमदर्दी हैं मगर साथ ही साथ इंसानियत भी हैं.

मेरी खुद कि राय हैं कि आंख के बदले आंख. उस अपराधी कि एक आंख उस महिला को दे दी जाय , जिस से कि महिला भी दुबारा दुनिया देख सके और और वो अपराधी भी.

11 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बिल्कुल सही लिखा तारकेश्वर जी..

अरूण साथी said...

aap sahi hai..yahi hona chahiye

Shah Nawaz said...

Taarkeshwar bhai, pehli baat to yeh ki aapko case ki puri knowledge hi nahi hai... Us mahila ki ankhon mein nahi balki purey chehre per tezaab dala gaya tha... Ek bahit hi khoobsurat ladki, ek behad khaufnaak aur behad badsurat ban kar reh gayi hai... Itna ki jidhar se nikal jay, udhar log Dar jaate hain... Dusri baat yeh ki vah ilaaj ke liye Videshon mein bhi dikha chuki hai.... Haalat itni dayniy hai ki... Usey dusri ankhen bhi nahi lagaai jaa sakti hain...

Shah Nawaz said...

aap itni asaani se Darinde se sahanubhuti rakh rahein hain, kyonki aapne us ladki ki pida ko jhela nahi hai... Mere vichar se to us ladke ke bhi pure chehre par Tezaab dala jaana chahiye, taaki use bhi pata chale ki is Ghinauni harkat se kisi ki zindagi per kya asar padta hai...

एस.एम.मासूम said...

इंसानियतऐसे जल्लाद के साथ जो किसी औरत की आँख मैं तेज़ाब डाल दे. ऐसी ही हमदर्दियाँ ऐसे जल्लादों की हिम्मत बढ़ाती हैं.रहम जल्लादों के साथ नहीं किया जाता ,इंसानों के साथ किया जाता है.
कल को आप किसी को फँसी की सजा होगी, किसी को उमर क़ैद , तो भी आप इंसानियत की दुहाई देंगे. भाई जो किसी का लिया है वही तो खोना होगा, यही इन्साफ है. इरान के फैसले से सहमत और यही इन्साफ है. आगे से कोई किसी भी महिला पे तेज़ाब डालना भूल जाएगा

DR. ANWER JAMAL said...

इकतरफ़ा प्रेम के मारे अंधे प्रेमी लड़की का इंकार सुनकर लड़की के चेहरे पर तेज़ाब फेंक देते हैं ताकि अगर वह उनकी न हो सकी तो वह किसी और की भी न हो सके । भारत में ऐसी घटनाएं आए दिन घटती रहती हैं ।
भारतीय क़ानून ईरान के इस्लामी क़ानून की तरह अपराधी को तुरंत दंडित नहीं करता । तुरंत क्या बल्कि अक्सर तो करता ही नहीं ।
एक औरत की क्या वैल्यू है ?
यहाँ तो पूरे के पूरे समुदाय का संहार कर दीजिए , क़ातिलों का बाल टेढ़ा होने वाला नहीं है ।
सन 1984 के दंगे में मारे गए सिक्खों के क़ातिलों में से आज तक किसी एक को भी फाँसी न हुई और अफ़ज़ल गुरू वग़ैरह को जिन्हें फाँसी की सज़ा सुना भी दी है तो उसे देते हुए डर लग रहा है ।
हमारे देश की अदालतें बढ़िया हैं और यहाँ सबको बिना कुछ ख़र्च किए जल्दी इंसाफ़ मिलता है , इसलिए ईरान को भारतीय अदालतों की तरह इंसाफ़ करना चाहिए ।
ऐसा कहने वाला कौन है ?

ख़ुद तो इंसाफ़ करना आता नहीं और जहाँ हो रहा है , वहाँ से सीखते नहीं , देखते नहीं।
ये वे आँखें हैं जो नफ़रत के तेज़ाब से खुद अंधी कर चुके हैं और अब सत्य और मार्ग दिखता ही नहीं ।

जयहिंद ।
वंदे ईश्वरम ।

Tarkeshwar Giri said...

मासूम भाई सजा का प्रावधान तो हर धर्म में सदियों से चला आ रहा हैं. लेकिन क्या अपराध या अपराधी कभी ख़त्म हुए हैं. आप कहते हैं कि दुबारा कभी कोई हिम्मत नहीं करेगा, तो फिर अपराधी दुबारा क्यों पैदा हो जाते हैं. हजारो सालो से अदालते सजा सुनाती चली आ रही हैं , मगर अपराध का दायरा बढता जा रहा हैं. आखिर क्यों ?

किलर झपाटा said...

यहाँ पर शाह नवाज़ मियाँ, मासूम मियाँ और जमाल मियाँ एकदम करेक्ट हैं और आप गिरी महाराज कन्फ़्यूज़्ड हैं। यदि आप वो लड़की होते जो उस दुष्ट की वजह से अंधी हो गई तो फिर पता चलता कि कितना कष्टदायी जीवन होता है जब चेहरे पर कोई तेजाब डाल देता है।
सही इंसाफ़ हुआ लड़की के साथ।
और बिल्कुल ठीक किया जा रहा है ईरान में उस पाजी के साथ।

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

प्रिय दोस्तों! क्षमा करें.कुछ निजी कारणों से आपकी पोस्ट/सारी पोस्टों का पढने का फ़िलहाल समय नहीं हैं,क्योंकि 20 मई से मेरी तपस्या शुरू हो रही है.तब कुछ समय मिला तो आपकी पोस्ट जरुर पढूंगा.फ़िलहाल आपके पास समय हो तो नीचे भेजे लिंकों को पढ़कर मेरी विचारधारा समझने की कोशिश करें.
दोस्तों,क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से
श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी लगाये है.इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है.मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ.
अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?
यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

Shah Nawaz said...

तारकेश्वर भाई,

अगर दंड देने से अपराध कम नहीं हुए हैं तो क्या दंड देने के प्रावधान को समाप्त कर देना चाहिए? अभी तक तो आप खुद कसाब और अफज़ल गुरु जैसों को जल्द से जल्द मौत की सजा देने की बात कर रहे थे?

वैसे मेरे विचार से तो किसी अपराधी की सजा को कम करने का अधिकार भोगी के अलावा किसी और को होना ही नहीं चाहिए... इन्साफ तो यही है, बाकी तो केवल समाज सुधार की कवायद ही हो कहलाई जा सकती है, इन्साफ नहीं.

अभी आप चौक पर लाल बत्ती जम्प करने का चालान 5-10 हज़ार कर दो, देखता हूँ किसकी हिम्मत होती है लाल बत्ती जम्प करने की. भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कानूनों को सख्त करना ही एकमात्र उपाय है.

हमारे यहाँ एक तो इन्साफ नहीं होता, ऊपर से जो सजा होती भी है वह भी इतनी देर बाद मिलती है की उसका महत्त्व समाप्त हो जाता है. कसाब का मामला इसका एक बेहतरीन उदहारण है.

Arunesh c dave said...

सही इंसाफ़ है जैसे को तैसा किसी को अधिकार नही किसी औरत की जिंदगी खराब करने की अब अपराधी हर दिन महसूस करेगा अपनी गलती को और इसे देख दूसरो की रूह कांपेगी ऐसा करने की सोच भर से