Friday, August 27, 2010

हजारो गाये कुर्बान हो जाएँगी -कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर- तारकेश्वर गिरी.




हजारो गायों कि बलि दे दी जाएगी कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर। और ये क़ुरबानी खुद दिल्ली कि सरकार देगी। क्योंकि विदेशी खिलाडियों ने और उनकी सरकार ने ये शर्त रखी हैं कि हमारे खिलाडियों को अगर दिल्ली सरकार रोज रात के खाने में अगर गाय का मांस देती हैं तो ठीक हैं , अन्यथा हमारे खिलाडी भारत में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम में हिस्सा नहीं लेंगे।






अब बताइए जरा हैं किसी के पास विरोध करने कि ताकत। कंहा हैं वो लोग जो लोग गाय के नाम पर राजनीती करते हैं, कंहा हैं वो लोग जो जीव हत्या का विरोध करते हैं।


दिल्ली सरकार भी क्या करे , उसकी मुखिया तो खुद भी गौ मांस भक्षक हैं।

46 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post .
Please come to my blog to read my new article about Namaz on road .

DR. ANWER JAMAL said...

भाई साहब ! गोरक्षा के नाम पर राजनीति करने वाले भी चुप है यहां तो। बड़े होटल और बड़े ठेके सभी इन्हीं ब्राह्मण बनियों के पास जो हैं।

Tarkeshwar Giri said...

Main aap se sahmat hun

Tarkeshwar Giri said...

Hamari Central Govt Bhi Nikkami ho Gai Hai.

Tarkeshwar Giri said...

Is vishay par Musalman Bandhu logo ko aage aana chahiye.

girish pankaj said...

आपकी सूचना से मै दहल गया हूँ. माथा शर्म से झुक गया है. अगर आज गाढ़ी, विनोबा जैसे देश महा लोग होते तो वे सरकार को हिला कर रख देते, कि भाड़ में जाये तुम्हारे खेल. गो-हत्या की शर्त पर अगर विदेशी आना चाहते है, तो वे अपने देश में ही रहे. नहीं करने ऐसे आयोजन जो गायों की लाशों पर हो. आज कोई ऐसा बड़ा वेता नहीं, जो इस बात का विरोध कर सके. दिल्ली सरकार से नैतिकता की अपेक्षा बेमानी है. किसी भी सरकार से यह अपेक्षा फिजूल है अब. यह निर्मम काल है, समय है. कुछ घटिया लोग, हिंसक लोग यही तर्क देंगे, कि देश की इज्ज़त का सवाल है. मैं कहूँगा , मै ऐसी इज्ज़त को दो कौड़ी की समझता हूँ, जो गो हत्या कर के प्राप्त होगी है. क्या हो गया है इस देश को? गो माँस तो पहले ही भेजा जा रहा है विदेश.. रोज़ कट रही है लगभग पचास हज़ार गाये. ''मुद्रा-राक्षस'' बड़ा प्यारा है इस देश को. चाहे गाय कटे, बकरी कटे, भैस कटे, बैल कटे. शर्म आने का सवाल ही नहीं. इस विषय पर मैं भी अलग से एक लेख लिखूंगा..फ़िलहाल इतना ही. क्योंकि खून खौल रहाहै. किसी के लिये गाली न निकल जाये.

सुज्ञ said...

घ्रणित निर्देश है
घ्रणित है राजनिति।
ये सरकारे तुष्टिकरण के
खेल से खुद उन्ही कि
तरह कसाई बन गई है।
कुछ लोग यदि विरोध भी
करेंगे तो विरोध को हिंदुत्व
का ठप्पा लगाकर मिसगाईड
कर दिया जायेगा।

girish pankaj said...

anvar jamal k kathan se mai bhi sahamat hoo.

Tarkeshwar Giri said...

Girish Ji main aapki Bhwawanwo ko samajh sakta hun, is mudde par sabko sath aana hoga

फ़िरदौस ख़ान said...

Nice Post...

निरंजन मिश्र (अनाम) said...

उफ्फ्!

ओशो रजनीश said...

ये राजनेता अपने लालच के लिए अपनी जनम देने वाली माँ की भी क़ुरबानी दे सकते है , गाय तो फिर भी गौ माता है ..........
http://oshotheone.blogspot.com/

honesty project democracy said...

गाय तो गाय पूरी दिल्ली इस गेम के पीछे के भ्रष्टाचार के गेम में कुर्बान हो चुकी है ,कितने लोगों की रोजी रोटी बर्बाद हो चुकी है और गरीबी ने कितनों की जिन्दगी तबाह कर दिया है इस गेम की वजह से पैदा हुयी कुव्यवस्था से ,अगर कोई बचा है तो वो है इस गेम के पीछे के भ्रष्टाचार के खिलाडी ,अब इनको भगवान और लोगों की हाय ही पकड़ेगा ...और सजा भी देगा ...

महफूज़ अली said...

आपकी सूचना से मै दहल गया हूँ. माथा शर्म से झुक गया है. अगर आज गाढ़ी, विनोबा जैसे देश महा लोग होते तो वे सरकार को हिला कर रख देते, कि भाड़ में जाये तुम्हारे खेल. गो-हत्या की शर्त पर अगर विदेशी आना चाहते है, तो वे अपने देश में ही रहे. नहीं करने ऐसे आयोजन जो गायों की लाशों पर हो. आज कोई ऐसा बड़ा वेता नहीं, जो इस बात का विरोध कर सके. दिल्ली सरकार से नैतिकता की अपेक्षा बेमानी है. किसी भी सरकार से यह अपेक्षा फिजूल है अब. यह निर्मम काल है, समय है. कुछ घटिया लोग, हिंसक लोग यही तर्क देंगे, कि देश की इज्ज़त का सवाल है. मैं कहूँगा , मै ऐसी इज्ज़त को दो कौड़ी की समझता हूँ, जो गो हत्या कर के प्राप्त होगी है. क्या हो गया है इस देश को? गो माँस तो पहले ही भेजा जा रहा है विदेश.. रोज़ कट रही है लगभग पचास हज़ार गाये. ''मुद्रा-राक्षस'' बड़ा प्यारा है इस देश को. चाहे गाय कटे, बकरी कटे, भैस कटे, बैल कटे. शर्म आने का सवाल ही नहीं. इस विषय पर मैं भी अलग से एक लेख लिखूंगा..फ़िलहाल इतना ही. क्योंकि खून खौल रहाहै. किसी के लिये गाली न निकल जाये.

महफूज़ अली said...

गाय तो गाय पूरी दिल्ली इस गेम के पीछे के भ्रष्टाचार के गेम में कुर्बान हो चुकी है ,कितने लोगों की रोजी रोटी बर्बाद हो चुकी है और गरीबी ने कितनों की जिन्दगी तबाह कर दिया है इस गेम की वजह से पैदा हुयी कुव्यवस्था से ,अगर कोई बचा है तो वो है इस गेम के पीछे के भ्रष्टाचार के खिलाडी ,अब इनको भगवान और लोगों की हाय ही पकड़ेगा ...और सजा भी देगा ...

महफूज़ अली said...

इन्ही दोनों कमेन्ट को मेरा कमेन्ट माना जाए....

Divya said...

बेहद शर्मनाक !

राज भाटिय़ा said...

क्या कहे जी यह नेता गरीबो को सब्ज बाग दिखा कर जीत जाते है ओर अपनी गरीबी दुर, ओर हमे गाय ओर बकरेन के पीछे लगा कर लडवाते है ओर खुद ऎश करते है, इस मै इन्न्नेताओ का क्या कसुर जागरुक हमे होना चाहिये, ओए ऎसी बातो का बिरोध करना चाहिये... कहां है आज गाय को मां कहने वाले???

Shah Nawaz said...

बहुत ही शर्मनाक बात है, हद तो यह है कि हो-हल्ला मचाने वाले संगठन भी चुप बैठे हुए हैं.

अनामिका की सदायें ...... said...

ऐसी शर्ते नहीं माननी चाहियें बल्कि अपनी शर्तों पर उन्हें बुलाना चाहिए.अब वो राम मंदिर वाले लगता है बहरे हो गए हैं.

Dr. Ayaz Ahmad said...

गिरी जी संघर्ष करो हम आपके साथ है ।

ललित शर्मा-للت شرما said...


गायों की हत्या मत करों-स्वामी श्रद्धानंद ने कहा था,जिनकी मुर्ती चांदनी चौक थाने के पास लगी है। गायों की हत्या करना निंदनीय है।
सार्थक लेखन के लिए आभार

प्रिय तेरी याद आई
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

मो सम कौन ? said...

ये मामला पहले भी एक बार उठ चुका है। दिल्ली सरकार इस की जिम्मेदारी दिल्ली नगर निगम पर डाल चुकी है, वो इस के लिये केन्द्र सरकार को जिम्मेदार बता देंगे या किसी और को, वो आगे किसी और को। इसी तरह से ’पासिंग द बक’ गेम चलता रहेगा और कॉमनवैल्थ गेम्स भी संपन्न हो जायेंगे।
’अतिथि देवो भव’

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय गिरी जी,
भावनायें भड़काने के लिये यह पोस्ट अच्छी है लेकिन क्या यह तथ्यों पर आधारित है ?
*** भारत में ही Kerala, West Bengal and the seven north eastern states में गोवध पर कोई पाबंदी नहीं है, Beef खुले आम बिकता है, एक्सपोर्ट होता है और खाया भी जाता है।
*** केवल कुछ हिन्दुओं के लिये गौमांस निषिद्ध है परंतु लगभग पूरी दुनिया के लिये Beef भोजन का प्रमुख स्रोत है।
*** क्या हमें हक है कि अपने धार्मिक विश्वासों को जबरिया किसी ऐसे पर लादें जो खेलने और खेलों में जीतने हमारे देश में आया है ?
*** आपको हकीकत बताने के लिये यहाँ से उद्धृत करता हूँ क्षमा करियेगा यह अंग्रेजी में है...

Banning the slaughter of cows will violate two fundamental rights at
the heart of India's Constitution - the freedom to live and act (and
eat) as one wishes (provided that doesn't infringe other people's
rights), and the right to "carry on any occupation, trade or
business". This violation is all the more egregious because it
panders to a particular group in India's multi-cultural,
multi-religious society - under the false pretext of respecting the
"religious sentiments" of a community.
जारी...

प्रवीण शाह said...

आगे पढ़िये...

To start with, a cow-slaughter ban will impose a heavy economic burden on society equivalent to more than half the grand total India annually spends on primary education in all schools put together. If the 10 million cows slaughtered each year are to be kept alive for only five years (that is, 50 million for one year), they will need as much additional pastureland as India currently has. If a paltry Rs 10
is spent on each animal daily, that will annually cost over Rs 18,000 crores! India's total primary education spending is Rs 35,00 crores.

Keeping economically useless, ailing, old cattle forcibly alive will mount further pressure on land and people. Worse, the Bill imposes a blanket ban on killing the cow and also its "progeny - including bulls. This will compel farmers to keep alive a class of useless animals, resulting in higher milk prices. There will be the additional burden of over $1 billion from lost exports of leather and meat products, mainly beef. Besides, at least 15 million people associated with the bovine-livestock economy, from trade in animals to leather-making, and trading in bones, will lose their livelihoods.This means an annual value-addition loss of Rs 15,000 crores.

It is doubtful if either the Hindus as a whole, or those who own
cattle, want cow-slaughter banned. Many, but not all, Hindus believe
the cow is sacred in some sense. But that's not reflected in the way
it's treated. A look at the emaciated, half-starved, cows that roam India's streets foraging for food and obstructing traffic should
convince the sceptic. Even more brutal is the treatment of bullocks, who are mercilessly beaten to make them work beyond their capacity.

Most Hindus have the farmer's attitude to cattle. They sell them to the butcher once their useful life is exhausted. The vast majority of India's cattle-owners are Hindus. So the cow-slaughter issue is related to intra-Hindu politics. Cattle-owners have even less patience with the male calves of exotic breeds of cows (which cannot serve as draught animals). They are butchered young.

Finally, it's wrong to claim that Hindus don't eat beef, and their
principal scriptures prohibit its consumption. Numerous Hindu
communities, especially the low castes and Dalits, regularly consume beef, as do India's 180 million non-Hindus.

For instance, in Kerala, beef accounts for 40 percent of all meat, and is consumed by four-fifths of the people. They include 72 Hindu communities. In India, beef is at least twice cheaper than lamb or chicken. It is the poor's preferred source of first-class protein. Absence of beef will raise their food bill.
Surveys of butchers in different states show that three-fourths of
all beef is consumed by non-Muslims. India's beef production has been rising at 7 percent a year, compared to 4 to 5 percent for mutton and chicken.

आभार!

पी.सी.गोदियाल said...

अफ़सोस मगर यह मानने में तनिक भी हिजक नहीं कि डाक्टर जमाल की टिपण्णी में बहुत कुछ सच छिपा है ! और ऊपर से ऐसे तूतिये अगर सत्ता में बैठे हो जो इटली की जूतियों पर मत्था ठेकना अपना परम धरम समझते है, तो फिर इस देश का क्या कहने ! इनकी घृणित चाल को ज़रा इस उदाहरण से समझिये, कि कैसे ये अपने मंसूबों को अंजाम देते है ; गृहमंत्री ने एक सोची समझी चाल के तहत ही कहा; भगवा आतंक , वह भी जानता है कि सच्चाई क्या है मगर एक तीर से दो शिकार ! कौंग्रेस का यह इतिहास रहा है कि वह मोहरे खड़े कर चाल चलती है और इस बार का मोहरा था चिदंबरम ! एक तरफ वोट बैंक को यह कहकर खुश कर दिया और दूसरी तरफ खुद ही सफाई और चिदंबरम को नसीहत देकर यह भी जतलाने की कोशिश की कि वे हिन्दू धर्म से भी तालमेल बनाये रख रहे है! इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे , इससे समाज पर क्या प्रभाव पडेगा , इससे इन्हें क्या लेना बस यों समझिये कि इन्होने यह कहकर बहुत से वोट अपने पक्ष में कर लिए , देश जाये भाड़ में ! बीजेपी वालों से उम्मीद रखना तो मैंने बहुत पहले छोड़ दिया क्योंकि सब सा---- एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है ! सेनाओं को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है, उनका मनोबल तोड़ा जा रहा है और अब जब चीन इनकी....... तब बौखलाने लगे है !

पी.सी.गोदियाल said...

अफ़सोस मगर यह मानने में तनिक भी हिजक नहीं कि डाक्टर जमाल की टिपण्णी में बहुत कुछ सच छिपा है ! और ऊपर से ऐसे तूतिये अगर सत्ता में बैठे हो जो इटली की जूतियों पर मत्था ठेकना अपना परम धरम समझते है, तो फिर इस देश का क्या कहने ! इनकी घृणित चाल को ज़रा इस उदाहरण से समझिये, कि कैसे ये अपने मंसूबों को अंजाम देते है ; गृहमंत्री ने एक सोची समझी चाल के तहत ही कहा; भगवा आतंक , वह भी जानता है कि सच्चाई क्या है मगर एक तीर से दो शिकार ! कौंग्रेस का यह इतिहास रहा है कि वह मोहरे खड़े कर चाल चलती है और इस बार का मोहरा था चिदंबरम ! एक तरफ वोट बैंक को यह कहकर खुश कर दिया और दूसरी तरफ खुद ही सफाई और चिदंबरम को नसीहत देकर यह भी जतलाने की कोशिश की कि वे हिन्दू धर्म से भी तालमेल बनाये रख रहे है! इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे , इससे समाज पर क्या प्रभाव पडेगा , इससे इन्हें क्या लेना बस यों समझिये कि इन्होने यह कहकर बहुत से वोट अपने पक्ष में कर लिए , देश जाये भाड़ में ! बीजेपी वालों से उम्मीद रखना तो मैंने बहुत पहले छोड़ दिया क्योंकि सब सा---- एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है ! सेनाओं को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है, उनका मनोबल तोड़ा जा रहा है और अब जब चीन इनकी....... तब बौखलाने लगे है !

पी.सी.गोदियाल said...

अफ़सोस मगर यह मानने में तनिक भी हिजक नहीं कि डाक्टर जमाल की टिपण्णी में बहुत कुछ सच छिपा है ! और ऊपर से ऐसे तूतिये अगर सत्ता में बैठे हो जो इटली की जूतियों पर मत्था ठेकना अपना परम धरम समझते है, तो फिर इस देश का क्या कहने ! इनकी घृणित चाल को ज़रा इस उदाहरण से समझिये, कि कैसे ये अपने मंसूबों को अंजाम देते है ; गृहमंत्री ने एक सोची समझी चाल के तहत ही कहा; भगवा आतंक , वह भी जानता है कि सच्चाई क्या है मगर एक तीर से दो शिकार ! कौंग्रेस का यह इतिहास रहा है कि वह मोहरे खड़े कर चाल चलती है और इस बार का मोहरा था चिदंबरम ! एक तरफ वोट बैंक को यह कहकर खुश कर दिया और दूसरी तरफ खुद ही सफाई और चिदंबरम को नसीहत देकर यह भी जतलाने की कोशिश की कि वे हिन्दू धर्म से भी तालमेल बनाये रख रहे है! इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे , इससे समाज पर क्या प्रभाव पडेगा , इससे इन्हें क्या लेना बस यों समझिये कि इन्होने यह कहकर बहुत से वोट अपने पक्ष में कर लिए , देश जाये भाड़ में ! बीजेपी वालों से उम्मीद रखना तो मैंने बहुत पहले छोड़ दिया क्योंकि सब सा---- एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है ! सेनाओं को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है, उनका मनोबल तोड़ा जा रहा है और अब जब चीन इनकी....... तब बौखलाने लगे है !

पी.सी.गोदियाल said...

"*** क्या हमें हक है कि अपने धार्मिक विश्वासों को जबरिया किसी ऐसे पर लादें जो खेलने और खेलों में जीतने हमारे देश में आया है ?"

श्रीमान परवीन शाह जी बुरा न माने तो बस यही कहूंगा कि आप जैसे सेक्युलरों से मुझे यही उम्मीद थी ! कुछ दिन पहले ही सीएनएन पर एक बहस देख रहा था धार्मिक स्वतंत्रता और दुसरे के धर्म के सम्मान पर ! एक क्रिश्चियन सज्जन का वह वाक्य आपके टिपण्णी को पढने के बाद याद आ गया कि " जब मैं अपने कुछ हिन्दू दोस्तों के साथ रेस्तरां में जाता हूँ तो दिल में गौ-मांस खाने की हार्दिक इच्छा के बावजूद भी इस बात का ध्यान रखते हुए कि हिन्दू मित्र के लिए यह अटपटा होगा मैं टेबल पर गौ-मांस सर्व करने का ऑर्डर नहीं देता ! "

जो तथ्य आपने दिए है वही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि इसने हिन्दुओ के नाम पर जयचंदों को पाला है ! जिनके लिए कोई ईमान कोई धर्म नहीं, सिर्फ मौक़ा परस्ती है ! अगर कोई हिन्दू धर्म से लाभ दिख रहा है तो उधर हो लिए , सेक्स कामना बढ़ रही है, गौमांस खाने की इच्छा हो रही है, चर्च और मिशनरियों से कोई फायदा हो रहा है, तो उधर हो लिए !

जब धार्मिक सम्मान को ठेस लगने की बात आई तो अमेरिका जैसा तथाकथित सेक्युलर देश भी मस्जिद बनाने के खिलाफ खडा हो गया मगर हम हिन्दू............................?

Tarkeshwar Giri said...

Thanks Godiyal Ji,

Main Praveen Shah ji se bilkul bhi sahmat nahi hun.

arvind said...

nice post....yah suchnaa padhakar bahut bura lagaa....ye hinduon ke dhaarmik bhaavanaa kaa apmaan hai....thanx for visiting my blog suggestion pe dhyaan de rahaa hun.

ab inconvenienti said...

क्या अरब या किसी मुस्लिम देश में में आप मेन्यु में पोर्क या घोड़ा खाने परोसने की शर्त रखेंगे?

यूरोप या अमेरिका जैसे उदार मने जाने वाले देश जापानी, चीनी, ताईवानी, बर्मी, थाई, वियतनामी और कोरियन खिलाडियों को कुत्तों का मांस परोसे जाने की अनुमति देंगे?

इन देशों में ऐसी कोई मांग ही नहीं उठेगी. पर यह अपना भारत है, अपमानित, कमज़ोर और भिखारी देश.

पी.सी.गोदियाल said...

@ ab inconvenienti;

Fantastic Sir, Hope Mr. Darpan shah and like minded people (Seculars) will read it.

पी.सी.गोदियाल said...

गिरी साहब एक सजेशन दूंगा कि इस पोस्ट को एक बार फिर से टिपण्णी समेत ब्लॉग पर दुबारा डाले ! शायद कुछ खुदगर्ज हिन्दुस्तानियों को दूसरी बार पढने पर थोड़ी शर्म आ जाये !

Tarkeshwar Giri said...

Ji Jarur

VICHAAR SHOONYA said...

@ ab inconvenienti
thumbs up to you sir..
& giri sahab good post.

anshumala said...

जी माफ़ करे मै तो शाकाहारी हु मै हर तरह के मास का विरोध करती हु पेट भरने के लिए बहुत कुछ है संसार में क्या किसी जीव की हत्या सिर्फ अपने जिव्हा के चटकारे के लिए करना सही है | ये मत कहिये की खिलाडियों के लिए मास जरुरी होता है हमारे ही देश में क्रिकेट के कई खिलाडी शाकाहारी है | जो मजबूत गठीला शरीर कई एक्टरो ने मास खाकर बनाया था वैसा ही शाहिद कपूर ने शाकाहारी रह कर बना ली | मतलब की आप शाकाहारी रह कर भी खिलाडी बन सकते है |

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

देख लीजिये प्रवीन शाह जी भी हिन्दू ही हैं.... अगर चुप रहते तो अधिक अच्छा होता लेकिन उनसे रहा नहीं गया, यही अन्तर है एक आम हिन्दू और मुसलमान के बीच...

राज भाटिय़ा said...

प्रवीण शाह.... जी चलिये आप की बात से सहमत हो जाते है, तो फ़िर सुअर के मासं मै क्या कमी है,? आप उस का स्वाद भी चख ले.

Mithilesh dubey said...

अच्छा तो यहाँ प्रवीण शाह जी भी आ गये हैं, ये तो होना ही था । ये भईया ऐसे ही किसी पोस्ट पर नहीं जाते, देखते हैं और सोचते हैं कि एसा क्या है जिसका मैं विरोध कर सकूं । खैर सरकार भी प्रवीण शाह की तरह तुच्छी मासिकता वाली है जो फायदे के लिए कुछ भी कर सकता है ।

प्रवीण शाह said...

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@ आदरणीय राज भाटिया जी,

सर, अच्छी सलाह है, मैं वाकई में pork sausages
खाता हूँ, बहुत उम्दा नाश्ता है, यदि मांसाहारी हों तो आजमाइयेगा कभी।

आभार!

प्रवीण शाह said...

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मित्र मिथिलेश दुबे,

खैर सरकार भी प्रवीण शाह की तरह तुच्छी मासिकता वाली है जो फायदे के लिए कुछ भी कर सकता है ।

जवाब तो मैं देता मित्र, पर क्या करूँ...:(

"तुच्छी मासिकता" का अर्थ नहीं मिल रहा गूगल करने पर भी...

कहीं आप 'तुच्छ मानसिकता' की बात तो नहीं कर रहे... जो मेरे विचार में उन लोगों में पाई जाती है, जो दूसरों के लेख बिना उनको श्रेय दिये अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं... :))


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Mahak said...

बेहद शर्मनाक और अफसोसजनक लेकिन यहाँ पर एक बात कहना चाहूँगा ,हमें सिर्फ गायें के माँस पर ही नहीं बल्कि प्रत्येक जीव के माँस को खाए जाने की निंदा करनी चाहिए क्योंकि जितना दर्द गायें को होता है उतना ही दर्द प्रत्येक जीव को होता है चाहे वो बकरा हो,मुर्गा हो,सूअर हो या कोई भी हो ,इसलिए मांसाहार पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध होना चाहिए

और जो लोग गाये को अपनी माता मानते हैं उन्हें तो तभी छत्रपति शिवाजी की भाँती ऐसे लोगों के सर काट देने चाहियें थे जब हिन्दुस्तान में पहली गाय काटी गई थी ,अगर पहले ही ऐसा हो गया होता तो आज ये नौबत ना आती

@गिरी जी मुद्दे को उठाने के लिए आपका आभार

girish pankaj said...

giri ji aapki post se prerit ho kar maine ek lekh likha hai. vah ''pravakta.com'' mey chhapa hai. khed hai ki is desh me bahut-se log manushya roop me paidaa to ho gaye hai, par hai ve danav hee. sooar ka maans khakar yaa gaay ka maans kha kar garv se bata rahe hai ki ham khate hai. kal yah bhi sambhav hai ki koi aaye aur bataye, ki mai doosaron ka 'mal' bhi khata hoo. gaay ko dharmik mudda mat banae. maine gaay par upanyas likha hai. mai dharmik nahee haoo. gaay ko upyogee-sarvadhik upyogee pashu maan kar upanyas likha hai. khed hai, ki ab log kuchh samajhane ke liye razee nahee. kisi ko maans chahiye, kisee ko dollar.

राज भाटिय़ा said...

प्रवीण जी धन्यवाद, मैने सभी प्रकार का मीट खाया, ओर खुब खाया , लेकिन पिछले १०, १५ सालो से मीट छोड कर शाका हारी बन गया हुं, मेरे दोस्तो मै हिन्दू मुस्लिम ईसाई सभी है, ओर हम सब एक दुसरे कि भावनाओ को भी ध्यान मै रखते है, एक जब एक दुसरे के घर पर जाते है तो पुरा ध्यान रखते है कि सामने वाला इस धर्म को मानता है इस लिये वो खाना ना बनाया जाये जिस से उस के धर्म को उस की भावना को ठेस ना पहुचे... ओर इसी कारण यहां सब मिल जुल कर रहते है, तो भारत मै हम क्यो नही एक दुसरे की भावनाओ का ख्याल रखते, बस छोटी सी बात है ओर सब प्यार से रह सकते है, क्यो ना हम एक्ल दुसरे की भावनाओ की इज्जत करे, हम सब ने यही इसी देश मै रहना है गलत बात के लिये मिल कर लडे, ना कि मिल कर आपस मै लडे.्वेसे मै कभी भी इन पंगो मै नही आता, ओर ना ही मेरे लिये कोई बेगाना है, आप सभी मेरे अपने हि हे
धन्यवाद

प्रवीण शाह said...

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@ girish pankaj,

"khed hai ki is desh me bahut-se log manushya roop me paidaa to ho gaye hai, par hai ve danav hee. sooar ka maans khakar yaa gaay ka maans kha kar garv se bata rahe hai ki ham khate hai. kal yah bhi sambhav hai ki koi aaye aur bataye, ki mai doosaron ka 'mal' bhi khata hoo."

एक सभ्य समाज में आपसी संवाद सभ्यता की सीमाओं के अंदर ही रहकर किया जाता है/किया जाना चाहिये... आप उन हदों का उल्लंघन कर रहे हैं यहाँ पर...यह मत भूलिये कि मेरे पास भी की बोर्ड है...कम लिखा है अधिक समझिये...

@ आदरणीय राज भाटिया जी,

धन्यवाद सर, सभी की भावनाओं की कद्र होनी चाहिये...इसी लिये मैंने यह आपत्ति उठाई थी...आप जैसे ही मेरे लिये भी सभी अपने हैं...खानपान के आधार पर कोई भेद मुझे स्वीकार नहीं...

अपने जवाबी कमेंट से मेरी नजर में आपका कद बहुत बढ़ गया है...आपको ब्लॉगवुड का आधारस्तंभ मानता हूँ...पुन: आभार!


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