Tuesday, March 22, 2011

और कितना इंतजार करूँ. ------तारकेश्वर गिरी.

और कितना इंतजार करूँ ,
किस हद तक डूब जावूँ
तेरा प्यार पाने के लिए.

आज भी याद हैं वो पल
जब मिले थे पहली बार,
तेरे इंतजार में , सड़क पर.

लम्हा -लम्हा वक्त गुजर गया
हम चलते रहे साथ उनके,
बस उनके इंतजार में.

आज भी साथ हैं वो
मगर दूर से,
इंतजार में , मैं खड़ा.

8 comments:

आलोक मोहन said...

वाह गिरी जी आप तो बड़े मस्त कवि निकले
रोमांटिक

आलोक मोहन said...

वाह गिरी जी आप तो बड़े मस्त कवि निकले
रोमांटिक

DR. ANWER JAMAL said...

Manbhawan Bhai Ki Sundar Kavita Dil ko Chhoo Rahi Hai.

Aur

मेरे मन की गहराईयों से
ख़ुशियाँ
उभरती रहती हैं
पल पल , हर पल

सागर है मन मेरा
और दूध विचार
मंथन में मगन हैं
ख़ुद मेरे रौशन और तारीक जज़्बे

बस अब करीब है अमृत
और फिर मैं हो जाऊँगा मुक्त
हरेक दाह , प्रदाह से
ज़मीर की मौत से
और जी सकूंगा
एक इंसान की तरह
सत्य के परमाणु के साथ
जग को रौशन करता हुआ

मेरी रचनात्मक पोस्ट का बुरा हश्र

Shah Nawaz said...

क्या बात है तारकेश्वर भाई... कमाल का लिख दिया यह तो....

Sunil Kumar said...

लम्हा -लम्हा वक्त गुजर गया
हम चलते रहे साथ उनके,
बस उनके इंतजार में.
इसे कहते है इंतजार की हद , बहुत खूब

राज भाटिय़ा said...

वाह गिरी जी आप ने तो मजंनू का रिकार्ड भी तोड दिया ...भाई अब बेठ भी जाओ:)
आज भी साथ हैं वो मगर दूर से, इंतजार में , मैं खड़ा.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गिरि भाई, बहुत खूब।

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं।
जानिए धर्म की क्रान्तिकारी व्याiख्याo।

एस.एम.मासूम said...

लम्हा -लम्हा वक्त गुजर गया
हम चलते रहे साथ उनके,
बस उनके इंतजार में.
.
ati sunder