Monday, September 13, 2010

तन्हाई में बैठे चुप-चाप, -तारकेश्वर गिरी.

तन्हाई में बैठे चुप-चाप,
उनकी यादो में खोया रहते थे।
जागते हुए भी दिन में,
उनके सपने देखा करते थे।

जमाना बदल गया लोग बदल गये।
यादे बदल गई , तरीके बदल गये।
प्यार का येहशाश वो दीवानगी,
सारे तौर तरीके बदल गये।

उनकी यादो में हम,
आज भी खोये रहते हैं।
ना जाने वो किसकी,
यादो में खोये रहते हैं।

10 comments:

arvind said...

vaah...bahut badhiya kavita.

महेन्द्र मिश्र said...

उनकी यादो में हम,
आज भी खोये रहते हैं ।
ना जाने वो किसकी,
यादो में खोये रहते हैं ।

बहुत बढ़िया रचना ... बधाई

मो सम कौन ? said...

गिरी जी,
मौसम का असर हो गया है आप पर भी, एन्जॉय करिये।
अन्यथा न मानें तो "प्यार का येहशाश वो दीवानगी," में सुधार कर लें।

Akhtar Khan Akela said...

तारकेश्वरी भाई आपकी यादें और उसका एहसास का जीवंत चित्रण अपने बहुत खूब अल्फाजों में किया हे बहुत बहुत मुबारकां भाई जान बधाई हो. अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

Mahak said...

जमाना बदल गया लोग बदल गये।
यादे बदल गई , तरीके बदल गये।
प्यार का येहशाश वो दीवानगी,
सारे तौर तरीके बदल गये।



बहुत बढ़िया गिरी जी


महक

veerubhai said...

yahi to baat hai ,zamaane ki ravaayat ,vyaavhaariktaa (bedili )ek taraf aur hamaaraa ek tarfaa pyaar ..
veerubhai
......kalkal pal pal bahtaa rhtaa hai ...

Shah Nawaz said...

अरे वाह!.... बेहतरीन!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत अच्छी रचना......
आपका ब्लॉग इंट्रो भी अच्छा है.....
क्योंकि देर से ही सही काम करना बड़ी बात .....

Ravindra Nath said...
This comment has been removed by the author.
Ravindra Nath said...

ध्यान से यह post भाभी जी न पढने पाएं