Saturday, April 9, 2011

हमने भी देखा हैं गाँधी को- तारकेश्वर गिरी.


दादा जी बचपन में
सुनाते थे,
अपने बारे में बताते थे,

गाँधी जी के किस्से
नमक कि कहानी
दादा जी कि जुबानी.

कहते थे हम सबसे,
गाँधी जी को
करीब से देखा हैं.

समय बदल गया,
गाँधी जी के
पुतले के साथ .

अब तो मेरे बच्चे भी
कहेंगे कि
हमने भी देखा हैं गाँधी को

जंतर -मंतर पे,
भूखे -लेटे हुए
अन्ना हजारे को .

9 comments:

आलोक मोहन said...

जिस देश में जवान सोते है वह बुजुर्गो को जगाना ही पड़ता है
हा मै अब गांधी जी के प्रभाव के बारे में सोच पा रहा है

निखिल आनन्द गिरि said...

गांधी बनना इतना आसाना भी नही.....आलोक जी ने सही कहा....जब युवा सोएं तो बूढ़ों को जागना पड़ता है

DR. ANWER JAMAL said...

भाई साहब !छोटी पोस्ट, काम की पोस्ट .

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

हम भी देख रहे हैं। सही सोच, सार्थक दृष्टि।
---------
प्रेम रस की तलाश में...।
….कौन ज्‍यादा खतरनाक है ?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

हम भी देख रहे हैं। सही सोच, सार्थक दृष्टि।
---------
प्रेम रस की तलाश में...।
….कौन ज्‍यादा खतरनाक है ?

Harsh said...

bahut khoob

हरीश सिंह said...

बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके., हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

psingh said...

बहुत अच्छी पोस्ट है भाई
बधाई......

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब, शुभकामनायें आपको