Thursday, July 8, 2010

मुसलमान भाई अगर वन्देमातरम गा देंगे तो क्या फर्क पड़ जायेगा ?- तारकेश्वर गिरी

मुसलमान भाई अगर वन्देमातरम गा देंगे तो क्या फर्क पड़ जायेगा ? बड़े दिनों से इस मुद्दे पर तरह - तरह के लेख आते रहे हैंपढ़ते ही दिमाग ख़राब हो जाता हैमैं खुद इस बात से सहमत नहीं हूँ की सिर्फ वन्देमातरम गा देने वाला भारतीय ही सच्चा देश भक्त हो गाअगर सच्चा देश भक्त वन्दे मातरम गा देने वाला होता , शायद हमारे देश की हालत इतनी बुरी नहीं होतीजितने भी M L A और M P पुरे देश से चुन कर के आते हैं वो सब वन्दे मातरम गाते है, सभी बड़े- बड़े अधिकारी वन्दे मातरम गाते हैं, मगर उन्ही अधिकारी और नेतावो मैं देश के गद्दार भी छुपे पड़े हुए हैंऔर ये बात आप सबको पता भी है

लेकिन वन्दे मातरम गाना एक अलग बात होती हैवन्दे मातरम से पुरे देश को एक जुटता मिलती है, वन्दे मातरम से पूरा भारतीय समाज एक हो जाता हैये भी सच हैकिसी साथी ने लिखा था की वन्दे मातरम गीत मैं दुर्गा माता की भक्ति नज़र आती है, जो की मुसलमान नहीं कर सकते

लेकिन मैं अपने साथियों से जानना चाहता हूँ की क्या ?

. अगर कोई मुसलमान भाई वन्दे मातरम गा देगा तो वो मुसलमान नहीं कहलायेगा
अगर कोई हिन्दू किसी मुसलमान मित्र के साथ किसी मस्जिद मैं चला जाता है तो क्या वो मुसलमान हो जायेगा
अगर कोई मुसलमान अपने किसी हिन्दू मित्र के साथ किसी मंदिर मैं जा कर के माथा टेक देगा तो क्या वो हिन्दू हो जायेगा
भारत मैं कितने ऐसे मुसलमान हैं जो रोज पांचो वक्त की नमाज पढ़ते हैं और पूरा रोजा रखते हैं, क्या वो मुसलमान नहीं हैं
भारत मैं कितने ऐसे हिन्दू हैं जो हर विधि विधान से पूजा पाठ करते हैं, क्या वो हिन्दू नहीं हैं


मेरा खुद का मानना है की ये सिर्फ एक धार्मिक और राजनितिक हवा हैएक आम भारतीय कभी भी ऐसा नहीं सोचता अगर अपने आस पास देखा जाय तो ७०% ऐसे लोग होंगे जिन्हें वन्देमातरम का गीत आता ही नहीं होगा

फिर इतना हंगामा क्योंवन्दे मातरम गीत सिर्फ स्कूल मैं ही लोग गा पाते हैं, उसके बाद तो भूल जाते हैंऔर स्कूल मैं पढने वाले बच्चो को क्या पता की धार्मिक और राजनितिक रंग क्या होता है , वो तो बचपन के रंग मैं ही रंगे होते हैं


38 comments:

Tarkeshwar Giri said...

हाँ इतना जरुर है की कुछ विदेशी ताकते हमारे देश मैं आज भी बैठी हुई हैं जो हमारे देशवाशियों को आपस मैं एक होते नहीं देख पा रही हैं.

महफूज़ अली said...

भई... हमें तो पूरा याद है वन्दे मातरम्.... जब कहेंगे ... तो गा भी देंगे....

वन्दे मातरम्....

Mohammed Umar Kairanvi said...

आपके बहुत से सवालों का जवाब इधर हैः

‘वन्दे मातरम्’ का अनुवाद, हकीक़त, & नफ़रत की आग बुझाइएः -डा. अनवर जमाल vande-matram-islamic-answer

http://hamarianjuman.blogspot.com/2009/11/vande-matram-islamic-answer.html

Mohammed Umar Kairanvi said...

वन्‍दे मात्रम तो मेरे दिये लिंक से जान लोगे कुछ बाप की भी फिक्र कर लिया करो

लिखो

लिखवाओ

वन्‍दे पित्रम अर्थात है पिता मैं तेरी वन्‍दना करता हूँ

Tarkeshwar Giri said...

उमर भाई, सही कह रहे हैं आप , लेकिन अगर आप साथ दे तो ना

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

महफूज जी जैसे कितने लोग हैं? बस यही संख्याबल गड़बड़ कर देता है./...

अनुनाद सिंह said...

वहाँ 'दर्शन' के नाम पर एक कट्टरता ही तो दी गयी है और आप वन्दे मातरम् गवाकर उसे ही छीनना चाहते हैं?

आनंद जी.शर्मा said...

पहला सवाल : कोई अबोध शिशु संस्कृत में रोयेगा या अरबी भाषा में रोयेगा या और किसी भी मानव निर्मित भाषा में रोयेगा तभी उसकी माँ दूध पिलाएगी क्या ?

और दूसरा सवाल : जब तक अबोध शिशु संस्कृत में या अरबी भाषा में या और किसी भी मानव निर्मित भाषा में नहीं रोयेगा - तब तक क्या वह अपनी जननी - अपनी माँ की औलाद नहीं बनेगा ?

जो भी - देश भक्त हो या पक्का देश द्रोही वतन फरोश - भारत माता के आंचल में घुसा बैठा है - उसे भारत माता अपनी औलाद समझ कर दूध पिला रही है | भारत माता की सोच में पूरी ईमानदारी है - जो बच्चा दूध पी रहा है - उसकी ईमानदारी वो जाने - उसका ईमान जाने |

देश भक्ति - वतन परस्ती - जिस मुल्क में हम और हमारे पुरखे पैदा हुए - हमने यहाँ की हवा में साँस ली - अन्न जल से यह शरीर बना - उस वतन से प्यार - उससे ईमानदारी - उससे वफ़ादारी - किसी भी मानव निर्मित भाषा के कुछ शब्दों की संरचना की मोहताज नहीं है |

फालतू बातों का शगूफा खड़ा करके तू तू मैं मैं करने और बिना मतलब का मनमुटाव बढ़ाना कोई अच्छी बात नहीं है |

जिन्हें भारत - हिंदुस्तान - इंडिया से सच्चे दिल से प्यार है - उनके लिए वन्दे मातरम का गाना जरुरी नहीं है - और जो क्षद्म देशद्रोही हैं - वतन फरोश हैं - वे दूसरों को दिखाने के लिए रोज पूरा शुद्ध स-स्वर वन्दे मातरम भी गाएं - तो लानत हैं उन पर |

मुझे तो वन्दे मातरम की चार लाइनें ही याद हैं - पूरा गाना याद करने की कोशिश ही नहीं की - और भविष्य में ना कोई इरादा है - इसका मतलब वन्दे मातरम का दुराग्रह रखने वाले क्या निकालेंगे ?

सुज्ञ said...

एक दम सटीक बात कह डाली अनुनाद जी ने,
सवाल यहां देशभक्ति का है ही नहिं,्देखिए शरीफ़ साहब की पोस्ट,देशभक्ति उनके लिये मज़बूरी है

राज भाटिय़ा said...

जो सब से पहले देश को चाहता है, देश के लिये मर मिटने को तेयार है वो ही देश भगत है, बाकी कोई भी गीत गाने से अगर किसी का धर्म खतरे मै पडता है तो वो धर्म केसा जो एक इंसान से डग मगा जाये? मैने तो नमाज भी पढी है, मस्जिद मै भी गया हुं, मेरे दोस्त जो पकिस्तान से है, ने मेरे साथ हमारे मंदिर मै खाना भी बनवाया, ओर पुजा मै भी साथ दिया, अब किस का धर्म खत्म हुआ ओर किस का नही.....हम दिपावली होली इकट्ट्रे खेलते है ईद ओर बक्रीद भी इकट्टे मनाते है......जब उस के टी वी पर पाकिस्तान का रष्ट्रिया गीत बजता है हम भी गुन गुनाते है, ओर वो भी हमारे साथ वन्दे मातरम गाता है.... कभी भी मेरा भगवान नारज नही हुआ मुझ से ओर उस का अल्लाह भी नाराज नही उस से

सत्य गौतम said...

जय भीम ।सब कुछ छोड़ो बोलो जय भीम

DR. ANWER JAMAL said...

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

DR. ANWER JAMAL said...

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

DR. ANWER JAMAL said...

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

DR. ANWER JAMAL said...

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

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दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

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ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

DR. ANWER JAMAL said...

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

sajid said...

जिन्हें भारत - हिंदुस्तान - इंडिया से सच्चे दिल से प्यार है - उनके लिए वन्दे मातरम का गाना जरुरी नहीं है - और जो क्षद्म देशद्रोही हैं - वतन फरोश हैं - वे दूसरों को दिखाने के लिए रोज पूरा शुद्ध स-स्वर वन्दे मातरम भी गाएं - तो लानत हैं उन पर |
आनंद जी.शर्मा से सहमत

Maria Mcclain said...

You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.

Voice Of The People said...

अगर नहीं गाएंगे तो क्या फर्क पड जाएगा? इसको गाने की जबरदस्ती और ना गाने के फतवे. दोनों एक सियासत है. इसका इंसानियत, धर्म या देशभक्ति का कुछ लेना देना नहीं है.. http://aqyouth.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.हटमल
यहाँ देखें कैसे मुस्लिम बच्चे राष्टीय गीत गाते हैं.

सहसपुरिया said...

जिन्हें भारत - हिंदुस्तान - इंडिया से सच्चे दिल से प्यार है - उनके लिए वन्दे मातरम का गाना जरुरी नहीं है - और जो क्षद्म देशद्रोही हैं - वतन फरोश हैं - वे दूसरों को दिखाने के लिए रोज पूरा शुद्ध स-स्वर वन्दे मातरम भी गाएं - तो लानत हैं उन पर |
आनंद जी.शर्मा से सहमत

सुज्ञ said...

डा ज़माल साहब,
दान की महिमा महत्वपूर्ण है, इस्लाम में जक़ात फ़र्ज़ है तो हिन्दुत्व में पुण्यकर्म्। बुद्धिजीवी इसे कहते हैं जरूरतमंद की मदद!!
इस बात को सभी मानते है कि दान देकर जताना नहिं चाहिए,दाएं हाथ से दो तो बाएं हाथ को खबर भी न हो। दान देकर शुक्रगुजारी की अपेक्षा भी निर्थक है। लेकिन दाता भले न चाहे, लेने वाले को अहसान फ़रामोश तो न होना चाहिए, जब वह अहसानफ़रामोश बनता है तो, न केवल दाता का दान देने का हौसला पस्त होता है, बल्कि दान का महत्व भी घट जाता है।
जैसे नमाज जक़ात आदि हम पर फ़र्ज़ है,और जब हम इन्हें अदा कर रहे हो, तब उसे महिमामय बनाकर पेश करते है,क्यो? क्योकि उसे देखकर अन्य लोग भी प्रोत्साहित हो। और ऐसे फ़र्ज़वान की प्रशंसा भी करते है,ताकि उसका व अन्य का हौसला बुलंद रहे। भले उसका फ़र्ज़ था, पर मालिक ने उसे मुक़रर तो किया है, अपनी रहमतों के लिये। साथ ही इन अच्छे कार्यो में कोई बाधक बनता है, दान के महत्व को खण्डित करने का प्रयास करता है वह भी दोष का भागी बनता है। ईष्या व द्वेष ग्रसित होकर जो पुण्य कर्म को छोटा व निरुत्साहित करता है,वह भी गुनाह है।मालिक की आज्ञानुसार नेकीओं के प्रसार को अवरूद्ध करना नफ़र्मानी है।
पानी बढे जो नाव में, घर में बढे जो दाम।
दोनों हाथ उडेलिये, यही अक़्ल का काम॥

Tarkeshwar Giri said...

Anwar Bhai sab thik to hai, ek hi comment bar-bar

Akhtar Khan Akela said...

bhaai jaan aadaab vndemaatrm , muslmaan vndemaatrm ke khilaaf nhin he aek zid ke khilaaf he aap shaayd jaante honge snsd en is git ko bhumt ke aadhar pr raashtrgaan maanne ke maamle me rijekt kr diyaa thaa or jngnmn hi raashtrgaan he jise gaanaa desh ki baadhytaa he nhin to szaa kaa praavdhaan he vndemaatrm kevl aek raashtr git he jise zbrdsti nhin gaayaa jaa sktaa or hmaaraa desh kaa snvidhgaan iski ijaazt bhi nhin detaa abhi aap nonvej nhin hen lekin men aapko nonvij khaane ke liyen mjboor krun to yeh meraa apraadh he isi trh se kuch shraarti ttvon ne vndemaatrm ko desh men sraart felaane or nfrt bhdkaane ka hthiyarr bnaakr iski ahmiyt km kr di he jbki desh kaa yeh git raashtr kaa gorv he aap btaaiye kyaa aap mhaaraashtr mumbai men hindi boln kaa saahs rkhte hen dkshin men aap hindi kyun nhin bolte vohto hmaari raashtrbhaashaa he jb hmaare desh men hindi nhin bolne vaale gddaaron ko chut he to is git ko lekr bkhedaa khdaa krnaa bnd krnaa chaahiye toki is raashtriy gorv git ki ahmiyt logon ke mn men bni rhe fir kyaa aapne kisi aar aes aes ,vishv hindu prishd, yaa jmaat islaami ki miting men raashtriy gaan jngnmn gaate hue dekhaa agr nhin to fir kyaa voh gddaar he hmaare skoolon men hmaare hindu muslim sbhi bchche vndeaatrm gaate he kbhi kisi ne inkaar nhin kiyaa aetraaz zor zbrdsti or nftr ki dukaan chlaane vaalon se he fir aap ghr se nikl kr vndemaatrm gvaane ki zid pr ade logon se puraa vndematrm kaa git sunkr btaanaa unhen khud yaad nhin he ke pura git kyaa he. akhtar khan akela kota rajsthan

प्रवीण शाह said...

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"जिन्हें भारत - हिंदुस्तान - इंडिया से सच्चे दिल से प्यार है - उनके लिए वन्दे मातरम का गाना जरुरी नहीं है - और जो क्षद्म देशभक्त हैं - वतन फरोश हैं - वे दूसरों को दिखाने के लिए रोज पूरा शुद्ध स-स्वर वन्दे मातरम भी गाएं - तो लानत हैं उन पर |
मुझे तो वन्दे मातरम की चार लाइनें ही याद हैं - पूरा गाना याद करने की कोशिश ही नहीं की - और भविष्य में ना कोई इरादा है - इसका मतलब वन्दे मातरम का दुराग्रह रखने वाले क्या निकालेंगे ? "


भाई आनंद जी० शर्मा से पूरी तरह सहमत!

जब आप यह मुद्दा उठा ही रहे हैं तो आलोचकों के इस जायज प्रश्न का उत्तर भी दीजिये:-

वंदे मातरम देवी दुर्गा की वंदना है। देखिये...

"तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हरि तुमि कर्म
त्वम् हि प्राणाः शरीरे।
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गड़ि मंदिरें-मंदिरे।"

तू ही मेरा ज्ञान, तू ही मेरा धर्म है,
तू ही मेरा अन्तर्मन, तू ही मेरा लक्ष्य,
तू ही मेरे शरीर का प्राण,
तू ही भुजाओं की शक्ति है,
मन के भीतर तेरा ही सत्य है,
तेरी ही मन मोहिनी मूर्ति
एक-एक मन्दिर में।

"त्वं हि दूर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमल-दल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी नवामि त्वां
नवामि कमलाम् अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्!
वन्दे मातरम्!"

तू ही दुर्गा दश सशस्त्र भुजाओं वाली,
तू ही कमला है, कमल के फूलों की बहार,
तू ही ज्ञान गंगा है, परिपूर्ण करने वाली,
मैं तेरा दास हूँ, दासों का भी दास,
दासों के दास का भी दास,
अच्छे पानी अच्छे फलों वाली मेरी माँ,
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।

हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्म के मानने वाले इस आधार पर यदि गायन का विरोध करते हैं... तो क्या यह आधार बिल्कुल गलत है?

आभार!

Vivek Rastogi said...

वन्दे मातरम, हमारे तो जितने भी मुसलमान दोस्त हैं सब गाते हैं, ये अलग बात है कि हमने कभी उन्हें मुसलमान नहीं समझा है केवल और केवल दोस्त ही समझा है, कभी ये बात जहन में आयी ही नहीं, कि वह मुसलमान है। रही बात राष्ट्रीयता की तो १५ अगस्त और २६ जनवरी को हमको घर से उठाकर परेड ग्राऊँड ले जाते थे। पता नहीं ये कैसे भारतीय हैं जिन्हें वन्दे मातरम गाने में आपत्ति है।

अमित शर्मा said...

आज काफी अच्छी खासी चर्चा चला दी आपने, पर हमें शायद थोडा सा अलग हटके भी सोचना होगा मेरे विचार में तो अगर राष्ट्र गीत किसी के धार्मिक विश्वास के आड़े आता है तो, इतनी बड़ी बात नहीं है की ये नियम ही बना दिया जाये की , "भारत में रहना होगा तो वन्देमातरम गाना ही होगा". लेकिन किसी के धार्मिक विश्वास अगर राष्ट्र सुरक्षा के आड़े आते हों तो तत्काल इसका निराकरण होना चहिये. चाहे फिर वह किसी भी धार्मिक विश्वास का अनुगामी क्यों ना हो. यह कहाँ की रीत रहे भारत में और गावे अरब के गीत"

Shah Nawaz said...

तारकेश्वर जी आपने यह बात सही लिखी है की केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, बेशक केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, लेकिन आप केवल बोल देने के लिए ही क्यों "वन्दे मातरम" गंवाना चाहते हैं? बहुत से मुसलमान इसी सोच को ध्यान में रखते हुए वन्दे मातरम बोलते हैं. लेकिन क्या केवल दिखाने के लिए इसे गाना धौखा नहीं है? आप जिसकी पूजा करते हैं, उनकी मैं इज्ज़त करूँ यह बात तो समझ में आती है, लेकिन जिनकी मैं पूजा नहीं करता, केवल अपने मित्रों को दिखाने अथवा महान कहलवाने के लिए दिखावे उनकी पूजा क्या सही कहलाई जा सकती है?

वैसे इस बहाने इस पर चर्चा की जाए तो यह एक अच्छा प्रयास कहा जाएगा. विचारों के आदान प्रदान से ही एक-दुसरे को समझने तथा एक-दुसरे के नजरिया को जानने का मौका मिलता है. मेरा यह विचार है कि किसी भी मुद्दे पर केवल अपनी सोच के हिसाब से धारणा बनाने की जगह जिन्हें ऐतराज़ है उनके नज़रिए से भी मुद्दे को देखना चाहिए. क्योंकि एक ही नज़रिए से देखने से किसी भी मसले का हल मुश्किल होता है.

'वन्दे मातरम' पर जो मुस्लिम समुदाय को एतराज़ है, उसमे सबसे पहली बात तो 'वन्दे' अर्थात 'वंदना' शब्द के अर्थ पर है. अक्सर इसका अर्थ 'पूजा' लगाया जाता है और आप सभी को यह पता होगा कि केवल एक ईश्वर की ही पूजा करने का नाम "इस्लाम" है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईश्वर के अलावा किसी और की प्रंशंसा भी नहीं की जा सकती है. बेशक किसी भी अच्छी चीज़ की प्रशंसा करना किसी भी धर्म में अपराध नहीं होता है. इससे पता चलता है कि मुसलमान धरती माँ की प्रशंसा तो कर सकते हैं लेकिन पूजा नहीं.

तो क्या किसी को उसके ईश के अलावा किसी और की पूजा करने के लिए बाध्य करना तर्क-सांगत कहलाया जा सकता है?

वैसे एक कटु सत्य यह भी है कि वन्देमातरम गाने भर से कोई देशप्रेमी नहीं होता है और देश के गद्दार वन्देमातरम गाकर देशप्रेमी नहीं बन सकते हैं. बंधू, आप मुसलमानों से क्या चाहते हैं? देश प्रेम या फिर वन्देमातरम? देश से प्यार देश की पूजा नहीं हो सकती है, और न ही देश की पूजा-अर्चना का मतलब देश से प्यार हो सकता है. हम अपनी माँ से प्यार करते हैं, परन्तु उस प्रेम को दर्शाने के लिए उनकी पूजा नहीं करते हैं. यह हमारी श्रद्धा नहीं है कि हम ईश्वर के सिवा किसी और को नमन करें, यहाँ तक कि माँ को भी नमन नहीं कर सकते हैं. जब कि ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि अगर वह मनुष्यों में से किसी को नमन करने की अनुमति देता तो वह पुत्र के लिए अपनी माँ और पत्नी के लिए अपने पति को नमन करने की अनुमति देता. ईश्वर की पूजा ईश्वर के लिए ही विशिष्ट है और ईश्वर के सिवा किसी को भी इस विशिष्टता के साथ साझा नहीं किया जा सकता हैं, न ही अपने शब्दों से और न कामों से.

भारत वर्ष को अपना देश मानने के लिए मुझे कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है 'वन्देमातरम' जैसे किसी गीत को गाने की. यह मेरा देश है क्योंकि मैं इसको प्रेम करता हूँ, यहाँ पैदा हुआ हूँ, और इसके कण-कण मेरी जीवन की यादें बसी हुई हैं. इसके दुश्मन के दांत खट्टे करने की मुझमे हिम्मत एवं जज्बा है. इसकी कामयाबी के गीत मैं गाता हूँ एवं पुरे तौर पर प्रयास भी करता हूँ. चाहे कोई मुझे गद्दार कहे, या मेरे समुदाय को गद्दार कहे, उससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता. क्योंकि यह मेरा देश है और किसी के कहने भर से कोई इसे मुझसे छीन नहीं सकता है.

रही बात उलेमा अर्थात (इस्लामिक शास्त्री) के द्वारा 'वन्दे मातरम' के खिलाफ फतवे की, तो यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि उलेमाओं का कार्य किसी भी प्रश्न पर इस्लाम के एतबार से सलाह देना है. और जब भी किसी क़ानूनी सलाह देने वाले से सलाह मांगी जाती है तो यह उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह जिस परिप्रेक्ष में सलाह मांगी गई है, उसमें सही स्थिति के अनुसार उचित क़ानूनी सलाह दे. कोई भी उलेमा अपनी मर्ज़ी के एतबार से फतवा (अर्थात इस्लामिक कानूनों के हिसाब से सलाह) दे ही नहीं सकता है. और जितनी बार भी किसी मुद्दे पर प्रश्न किया जाता है तो उनका फ़र्ज़ है कि उतनी बार ही वह उक्त मुद्दे पर उचित सलाह (अर्थात फतवा) दें. वैसे उलेमा का कार्य सिर्फ शिक्षण देना भर है. उनको मानना या मानना इंसान की इच्छा है. अगर कोई उलेमा इसलाम की आत्मा के विरूद्व कुछ भी कहता है, तो उसकी बात का पालन करना भी धर्म विरुद्ध है.

तारकेश्वर जी, दिखावे के लिए क्यों गंवाना चाहते हैं "वन्दे मातरम"?

Shah Nawaz said...

तारकेश्वर जी आपने यह बात सही लिखी है की केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, बेशक केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, लेकिन आप केवल बोल देने के लिए ही क्यों "वन्दे मातरम" गंवाना चाहते हैं? बहुत से मुसलमान इसी सोच को ध्यान में रखते हुए वन्दे मातरम बोलते हैं. लेकिन क्या केवल दिखाने के लिए इसे गाना धौखा नहीं है? आप जिसकी पूजा करते हैं, उनकी मैं इज्ज़त करूँ यह बात तो समझ में आती है, लेकिन जिनकी मैं पूजा नहीं करता, केवल अपने मित्रों को दिखाने अथवा महान कहलवाने के लिए दिखावे उनकी पूजा क्या सही कहलाई जा सकती है?

वैसे इस बहाने इस पर चर्चा की जाए तो यह एक अच्छा प्रयास कहा जाएगा. विचारों के आदान प्रदान से ही एक-दुसरे को समझने तथा एक-दुसरे के नजरिया को जानने का मौका मिलता है. मेरा यह विचार है कि किसी भी मुद्दे पर केवल अपनी सोच के हिसाब से धारणा बनाने की जगह जिन्हें ऐतराज़ है उनके नज़रिए से भी मुद्दे को देखना चाहिए. क्योंकि एक ही नज़रिए से देखने से किसी भी मसले का हल मुश्किल होता है.

'वन्दे मातरम' पर जो मुस्लिम समुदाय को एतराज़ है, उसमे सबसे पहली बात तो 'वन्दे' अर्थात 'वंदना' शब्द के अर्थ पर है. अक्सर इसका अर्थ 'पूजा' लगाया जाता है और आप सभी को यह पता होगा कि केवल एक ईश्वर की ही पूजा करने का नाम "इस्लाम" है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईश्वर के अलावा किसी और की प्रंशंसा भी नहीं की जा सकती है. बेशक किसी भी अच्छी चीज़ की प्रशंसा करना किसी भी धर्म में अपराध नहीं होता है. इससे पता चलता है कि मुसलमान धरती माँ की प्रशंसा तो कर सकते हैं लेकिन पूजा नहीं.

तो क्या किसी को उसके ईश के अलावा किसी और की पूजा करने के लिए बाध्य करना तर्क-सांगत कहलाया जा सकता है?

वैसे एक कटु सत्य यह भी है कि वन्देमातरम गाने भर से कोई देशप्रेमी नहीं होता है और देश के गद्दार वन्देमातरम गाकर देशप्रेमी नहीं बन सकते हैं. बंधू, आप मुसलमानों से क्या चाहते हैं? देश प्रेम या फिर वन्देमातरम? देश से प्यार देश की पूजा नहीं हो सकती है, और न ही देश की पूजा-अर्चना का मतलब देश से प्यार हो सकता है. हम अपनी माँ से प्यार करते हैं, परन्तु उस प्रेम को दर्शाने के लिए उनकी पूजा नहीं करते हैं. यह हमारी श्रद्धा नहीं है कि हम ईश्वर के सिवा किसी और को नमन करें, यहाँ तक कि माँ को भी नमन नहीं कर सकते हैं. जब कि ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि अगर वह मनुष्यों में से किसी को नमन करने की अनुमति देता तो वह पुत्र के लिए अपनी माँ और पत्नी के लिए अपने पति को नमन करने की अनुमति देता. ईश्वर की पूजा ईश्वर के लिए ही विशिष्ट है और ईश्वर के सिवा किसी को भी इस विशिष्टता के साथ साझा नहीं किया जा सकता हैं, न ही अपने शब्दों से और न कामों से.

भारत वर्ष को अपना देश मानने के लिए मुझे कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है 'वन्देमातरम' जैसे किसी गीत को गाने की. यह मेरा देश है क्योंकि मैं इसको प्रेम करता हूँ, यहाँ पैदा हुआ हूँ, और इसके कण-कण मेरी जीवन की यादें बसी हुई हैं. इसके दुश्मन के दांत खट्टे करने की मुझमे हिम्मत एवं जज्बा है. इसकी कामयाबी के गीत मैं गाता हूँ एवं पुरे तौर पर प्रयास भी करता हूँ. चाहे कोई मुझे गद्दार कहे, या मेरे समुदाय को गद्दार कहे, उससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता. क्योंकि यह मेरा देश है और किसी के कहने भर से कोई इसे मुझसे छीन नहीं सकता है.

रही बात उलेमा अर्थात (इस्लामिक शास्त्री) के द्वारा 'वन्दे मातरम' के खिलाफ फतवे की, तो यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि उलेमाओं का कार्य किसी भी प्रश्न पर इस्लाम के एतबार से सलाह देना है. और जब भी किसी क़ानूनी सलाह देने वाले से सलाह मांगी जाती है तो यह उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह जिस परिप्रेक्ष में सलाह मांगी गई है, उसमें सही स्थिति के अनुसार उचित क़ानूनी सलाह दे. कोई भी उलेमा अपनी मर्ज़ी के एतबार से फतवा (अर्थात इस्लामिक कानूनों के हिसाब से सलाह) दे ही नहीं सकता है. और जितनी बार भी किसी मुद्दे पर प्रश्न किया जाता है तो उनका फ़र्ज़ है कि उतनी बार ही वह उक्त मुद्दे पर उचित सलाह (अर्थात फतवा) दें. वैसे उलेमा का कार्य सिर्फ शिक्षण देना भर है. उनको मानना या मानना इंसान की इच्छा है. अगर कोई उलेमा इसलाम की आत्मा के विरूद्व कुछ भी कहता है, तो उसकी बात का पालन करना भी धर्म विरुद्ध है.

तारकेश्वर जी, दिखावे के लिए क्यों गंवाना चाहते हैं "वन्दे मातरम"?

सुज्ञ said...

॰ प्रवीण जी,

आप जैसा विद्वान भी उन तर्को में बह गया?
वन्दे मातरम् देवी दुर्गा की वंदना है?
तो फ़िर आगे तो कमला (लक्ष्मी)और वाणी विद्यादायिनी (सरस्वती) का भी उल्लेख है। देखिये…
"त्वं हि दूर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमल-दल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी नवामि त्वां
नवामि कमलाम् अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्!
वन्दे मातरम्!"

साधारण सी बात है,ये सभी देवियां विषेश गुणों की प्रतीक मात्र है और यह सभी जानते है,और यहां तो उन प्रतीकों का भी धरती मां के लिये प्रतिकात्मक उपयोग किया गया है।
प्रतिक अलंकरण से गुणों का बखान कर लेना,किसी भी धर्म में या बिनधर्म में गलत हो।

Tarkeshwar Giri said...

मेरे प्रिय शाहनवाज जी और बाकि ब्लोगेर साथी.

मैंने दोनों बाते कंही हैं की गीत गाने से न ही कोई देश भक्त होगा और ना गाने से ना ही कोई देश द्रोही. मेरा मतलब तो देश के उस सम्मान से है जिसके सम्मान के लिए ये गीत गया जाता है. पूरी दुनिया मैं हिंदुस्तान ही एक ऐसा देश है , जिसके निवासी उस देश को भारत माता या धरती माँ कहते हैं. जिस मिटटी मैं जन्म लिया उसे माँ कहते हैं, उस माँ के रूप उसकी पूजा, उसकी वंदना या उसका गुणगान करते हैं.

ये भारत की संस्कृति है. की पेड़ो, नदियों, झरनों, पहाड़ो की पूजा या इज्जत करता है, या ये कहले की प्रकीर्ति की पूजा करता है, या इज्जत करता है. और वन्दे मातरम मैं भी येही नज़र आता है की ये गीत पूरी तरह से भारतीय संस्कृति की झलक दिखता है. भारतीय संस्कार का आइना दिखता है ये गीत.

भारत एक विशाल देश है, और छोटे - बड़े बहुत से समाज. हर समाज का अलग - अलग रूप.

इस्लाम सिर्फ एक इश्वर की पूजा की अनुमति देता है. मैं खुद सहमत हूँ इस बात से, कंही ना कंही हमारे धर्म ग्रंथो मैं भी एक इश्वर की बात मिलती है, लेकिन एक इश्वर वाद के चक्कर मैं ऐसा तो नहीं ना की हम बाकि लोगो को कोई इज्जत नहीं देंगे. इश्वर एक है ये सिर्फ इस्लाम ही नहीं अपितु सारे धर्म येही कहते हैं. लेकिन कंही न कंही बहु पूजा पद्धति इस्लाम मैं भी है. जैसे की अजमेर शरीफ , कलियर शरीफ, हज़रात निजामुद्दीन जैसी पवित्र जगहों पर जा करके सर झुकाना. बल्कि इन जगहों पर इस्लाम की एक अलग ही दुनिया दिखती है. जंहा पर हिन्दू हो मुस्लमान सब एक साथ एक मंच पर खड़े होते हैं और पूजा करते हैं या कह ले की इबादत करते हैं.

Tarkeshwar Giri said...

मेरे प्रिय शाहनवाज जी और बाकि ब्लोगेर साथी.

मैंने दोनों बाते कंही हैं की गीत गाने से न ही कोई देश भक्त होगा और ना गाने से ना ही कोई देश द्रोही. मेरा मतलब तो देश के उस सम्मान से है जिसके सम्मान के लिए ये गीत गया जाता है. पूरी दुनिया मैं हिंदुस्तान ही एक ऐसा देश है , जिसके निवासी उस देश को भारत माता या धरती माँ कहते हैं. जिस मिटटी मैं जन्म लिया उसे माँ कहते हैं, उस माँ के रूप उसकी पूजा, उसकी वंदना या उसका गुणगान करते हैं.

ये भारत की संस्कृति है. की पेड़ो, नदियों, झरनों, पहाड़ो की पूजा या इज्जत करता है, या ये कहले की प्रकीर्ति की पूजा करता है, या इज्जत करता है. और वन्दे मातरम मैं भी येही नज़र आता है की ये गीत पूरी तरह से भारतीय संस्कृति की झलक दिखता है. भारतीय संस्कार का आइना दिखता है ये गीत.

Tarkeshwar Giri said...

भारत एक विशाल देश है, और छोटे - बड़े बहुत से समाज. हर समाज का अलग - अलग रूप.

इस्लाम सिर्फ एक इश्वर की पूजा की अनुमति देता है. मैं खुद सहमत हूँ इस बात से, कंही ना कंही हमारे धर्म ग्रंथो मैं भी एक इश्वर की बात मिलती है, लेकिन एक इश्वर वाद के चक्कर मैं ऐसा तो नहीं ना की हम बाकि लोगो को कोई इज्जत नहीं देंगे. इश्वर एक है ये सिर्फ इस्लाम ही नहीं अपितु सारे धर्म येही कहते हैं. लेकिन कंही न कंही बहु पूजा पद्धति इस्लाम मैं भी है. जैसे की अजमेर शरीफ , कलियर शरीफ, हज़रात निजामुद्दीन जैसी पवित्र जगहों पर जा करके सर झुकाना. बल्कि इन जगहों पर इस्लाम की एक अलग ही दुनिया दिखती है. जंहा पर हिन्दू हो मुस्लमान सब एक साथ एक मंच पर खड़े होते हैं और पूजा करते हैं या कह ले की इबादत करते हैं.

Shah Nawaz said...

तारकेश्वर जी, मैं आपके "देश को सम्मान देने" के तर्क से पूरी तरह सहमत हूँ. जिसने अपने देश का ही सम्मान नहीं किया वह भला किसी और चीज़ का क्या सम्मान करेगा! मगर मित्र, सम्मान और पूजा में फर्क होता है, होता है या नहीं?

रही बात किसी भी दरगाह पर जा कर सर झुकाने की, तो इस्लाम का मतलब है केवल और केवल ईश्वर को अपना ईश मानकर उसके आगे सर झुकाना, उसी को पालनहार मानना और उसके सिवा हर एक को अपना पालनहार मानने से इनकार करना. वैसे इस्लाम का मतलब किसी धर्म विशेष से नहीं है, बल्कि "ईश्वर को सम्पूर्ण समर्पण करने से है". और जो भी ईश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पित हो, उसकी इच्छा के अनुसार ही जीवन के हर पल को गुजारता हो वह इस्लाम का मानने वाला है, चाहे आप हो अथवा मैं.

Sharif Khan said...

‘‘अल्लाह के एक और केवल एक होने पर विश्वास रखना, अल्लाह के समकक्ष किसी को न समझना तथा केवल उसी की इबादत (वन्दना या पूजा) करना‘‘ इस्लाम धर्म की बुनियाद है। इस प्रकार जब अल्लाह के अलावा किसी की इबादत जाइज़ ही नहीं है और इस्लाम धर्म की मूल भावना के ही विरुद्ध है तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि एक
मुसलमान तभी तक मुसलमान है जब तक वह
अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत नहीं
करता चाहे मां(जननी) हो, वतन हो, पवित्र किताब हो या फिर कुछ और हो। जहां तक मातृभूमि की पूजा का सवाल है, तो इस बारे में केवल इतना ही कहना काफ़ी है कि पूजा तो अपनी मां की भी नहीं की जा सकती जो हमारी वास्तविक जननी है। सम्मान में सर्वोच्च स्थान मां का अवश्य है परन्तु पूजनीय नहीं है। अतः मुसलमानों पर उनकी की आस्था और विश्वास के खिलाफ़ वन्दे मातरम् गीत को थोपकर क्या हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को चोट नहीं पहुंचाई जा रही है ? अतः देश के बुद्धिजीवी वर्ग से हमारी अपील है कि वह संविधान का अध्ययन करके देखे कि वन्दे मातरम् गीत को थोपकर मुसलमानों को इस्लाम धर्म की मूल भावना के विरुद्ध कार्य करने के लिये मजबूर करना क्या संविधान के अनुसार अपराधिक कार्य है ? और यदि संविधान इसको अपराधिक कार्य मानता हो तो ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्यवाही करके देश में पनप रहे नफरत के माहौल से देश को बचाने में योगदान करें।
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Mahatab said...

ला इलाह इलअल्लाह=उस परमेश्वर के सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है, अतः वंदना सिर्फ़ और सिर्फ़ परमेश्वर की ही होनी चाहिए, माँ की या मुल्क की वंदना करना गुनाह है।
"वंदे परमेश्वरम"

Ghalib raza said...

कड्वा सच